रेडियोधर्मी प्रदूषण के प्रमुख दुष्प्रभावों को लिखिए तथा रेडियोधर्मी प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपायों का वर्णन कीजिए।

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विध्वंसकारी पदार्थों में रेडियोधर्मी पदार्थ सर्वाधिक विषकारी (Toxic) होते हैं। जैविक विषयों की तुलना में रेडियोधर्मी पदार्थों में हानिप्रद कारक अधिक उच्च होते हैं। उदाहरण के लिये, रेडियम नामक रेडियोधर्मी तत्व आर्सेनिक नामक विष से 25 हजार गुना अधिक प्रभावशाली होता है। वस्तुतः रेडियोधर्मी का प्रभाव स्थलमण्डल, जलमण्डल, वायुमण्डल तथा जैवमण्डल पर समान रूप से देखा जा सकता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न देने वाला एक ऐसा पर्यावरणीय प्रदूषण है जो रेडियोधर्मी खनिजों के विखण्डन के समय किसी कारणवश या भूलवश, रेडियोधर्मिता के विकिरण वायुमण्डल में मिल जाने से हो जाता है। अतः रेडियोधर्मिता के विकिरण से उत्पन्न प्रदूषण रेडियोधर्मी या नाभिकीय प्रदूषण कहा जाता है। यह प्रदूषण परमाणु विद्युतगृहों तथा परमाणु विस्फोटों पर परमाणु हथियारों से तो उत्पन्न होता ही है, साथ ही औषधि निर्माण उद्योगों तथा शोधों में रेडियोधर्मी खनिजों का असावधानीपूर्वक किया गया उपयोग रेडियोधर्मी प्रदूषण उत्पन्न करता है। रेडियोधर्मी विकिरण से रेडियोधर्मी तत्वों के अति सूक्ष्म कण सैकड़ों वर्षों तक पर्यावरण में बने रहते हैं तथा पर्यावरण को प्रदूषित करते रहते हैं। यह एक ऐसा प्रदूषण है जिसने पृथ्वी पर समस्त मानव जाति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण के स्रोत (Source of Radiotic Pollution)

(1) प्राकृतिक स्रोत-इन स्रोतों में प्रमुख रूप से भूगर्भ में विद्यमान रेडियोधर्मी तत्वों के विशाल भण्डार हैं। इन रेडियोधर्मी तत्वों में यूरेनियम, थोरियम, प्लूटोनियम तथा रेडियम प्रमुख हैं। सागरीय तली पर मिलने वाले अवसादों में भी रेडियोधर्मी तत्वों की विशाल राशि संचित है। सामान्यतया एक मानव को प्रतिवर्ष 50m rad रेडियोधर्मिता स्थलीय विकिरण से प्राप्त होती है, लेकिन जिन क्षेत्रों (जैसे केरल राज्य) में रेडियोधर्मी तत्वों के संचित भण्डार हैं, उनमें प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाली यह रेडियोधर्मिता 2000m rad तक प्राप्त होती है। इसके अलावा ब्रह्माण्ड से पृथ्वी पर प्राप्त होने वाली ब्रह्माण्डीय किरणों से भी रेडियोधर्मी प्रदूषण का स्तर बढ़ता है।

(2) कृत्रिम स्रोत-रेडियोधर्मी प्रदूषण के लिये उत्तरदायी स्रोतों में ये कृत्रिम स्रोत भी सम्मिलित हैं–(i) एक्स-रे मशीन, (ii) परमाणु परीक्षण, (iii) आण्विक भट्टियों के अपशिष्ट, (iv) परमाणु भट्टियों से होने वाला रिसाव, (v) औद्योगिक, चिकित्सा तथा शोध के लिए रेडियोधर्मी तत्वों के उपयोग स्थल, (vi) घड़ी के रेडियम डायल तथा रंगीन टी.वी.

रेडियोधर्मी प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Side Effects of Radiotic Pollution)

यह प्रदूषण अन्य प्रदूषणों की तुलना में कई गुना घातक होता है तथा उसका प्रभाव प्रभावित क्षेत्र में लम्बे समय तक कायम रहता है। रेडियोधर्मी प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले दुष्प्रभाव निम्नलिखित है

(1) शारीरिक दुष्प्रभाव – रेडियोधर्मिता मानव के शरीर की कोशिकाओं तथा तन्तुओं पर सीधे क्रिया करती है जिसके दुष्प्रभाव से कैन्सर जैसी भयानक बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। विश्वभर में रेडियोधर्मिता का परिणाम यह हुआ कि विश्व में कैन्सर के रोगियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। एक्स-रे मशीनों पर कार्य करने वाले, घड़ियों के डायल पर रेडियम पेण्ट करने वाले तथा यूरेनियम खदानों में कार्य करने वाले व्यक्तियों में कैन्सर होने की सम्भावना सामान्य व्यक्ति की तुलना में कई गुना अधिक होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अगस्त, 1945 में जापान के हिरोशिमा तथा नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बर्मों के परिणामों को उन नगरों के नागरिक आज भी भुगत रहे हैं। अप्रैल, 1986 में रूस के चेरेनोविल परमाणु रियेक्टर में हुए विकिरण रिसाव से सैकड़ों व्यक्ति मारे गये। यही नहीं, रेडियोधर्मिता से त्वचा तथा श्वास की अनेक बीमारियाँ तो होती ही हैं, साथ ही इसका दुष्प्रभाव गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

(2) गुणसूत्र प्रभाव-रेडियोधर्मिता के प्रभाव से मानव शरीर गुणसूत्रों (Genes) में अनचाहे परिवर्तन होने लगते हैं। गुणसूत्रों में परिवर्तन होने से बच्चे अपंग तथा विकलांग पैदा होते हैं। गुणसूत्र परिवर्तन का दुष्प्रभाव पेड़-पौधों तथा जीव-जन्तुओं पर भी देखा जाता है।

(3) रेडियोधर्मी से प्रभावित खाद्य सामग्री प्रदूषित हो जाती है।

(4) जिन सागरीय भागों में परमाणु परीक्षण किये जाते हैं, वहाँ रेडियोधर्मिता के प्रभाव से अधिकांश सागरीय जीव मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। साथ ही ऐसे सागरीय भागों में स्थित द्वीपों पर निवास करने वाली जनसंख्या का जीवन भी संकट में पड़ जाता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपाय (Measure to Control Radiotic Pollution)

(1) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाकर परमाणु बम तथा परमाणु हथियारों के निर्माण, परीक्षण तथा उपयोग पर कठोर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिये।

(2) किसी भी देश को दूसरे देश के परमाणु संयन्त्रों पर हमला करने का अधिकार न हो। यदि कोई देश ऐसा करता भी है तो अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाकर उस पर कठोर आयात-निर्यात एवं राजनैतिक प्रतिबन्ध लगा देने का प्रावधान रखा जाये। ऐसा करने पर परमाणु हमले की सम्भावनाओं को कम किया जा सकता है।

(3) परमाणु अपशिष्ट व कचरे के निपटान के लिये सुरक्षित स्थानों का चयन किया जाना चाहिये तथा परमाणु अपशिष्ट व कचरे को भू-गर्भ में इस प्रकार दबा देना चाहिये कि भविष्य में परमाणु से किसी भी प्रकार का रेडियोधर्मी विकिरण न हो सके।

(4) परमाणु संयन्त्रों से रेडियोधर्मिता का रिसाव व विकिरण किसी भी स्थिति में नहीं होने देना चाहिये, इसके लिये कठोर सुरक्षात्मक उपाय अपनाने की आवश्यकता है।

(5) समय-समय पर विश्व के विभिन्न भागों में रेडियोधर्मिता के स्तर का मापन किया जाना चाहिये। यदि किसी क्षेत्र में रेडियोधर्मिता का स्तर बढ़ रहा है तो उसके कारणों का शीघ्र पता लगाकर रेडियोधर्मिता के स्तर को कम करने के लिये आवश्यक उपाय किये जायें।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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