मरुक्रमण या शुष्क संचय पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिएक

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नग्न चट्टान (bare rock) वायु द्वारा प्रवाहित मृदा (wind blown sand) एवं अन्य पानी की कमी वाली परिस्थितियाँ युक्त स्थलों पर पादप समुदाय के विकास के विभिन्न चरणों को ही मरुक्रमण (xerosere) कहते हैं। मरुक्रमण अग्रलिखित चरणों में पूर्ण होता है—

1. क्रस्टोज लाइकेन अवस्था (Crustose lichen stage) —तीव्र सूर्य प्रकाश, पानी एवं पोषक पदार्थों (nutrients) की कमी आदि के कारण नग्न चट्टानों (bare rocks) पर केवल विशिष्ट प्रकार के पौधे ही विकसित होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में पूर्वगामी समुदाय (pioneer community) के रूप में केवल क्रस्टोज लाइकेन्स (Crustose सक्षम होते हैं। ये लाइकेन्स धीमी गति से वृद्धि करते हैं तथा पानी की अत्यधिक कमी (desication) को सहन करने की क्षमता रखते हैं। वर्षा होने पर ये लाइकेन, स्पंज (sponge) की भाँति जल का अवशोषण करके तेजी से वृद्धि करते हैं। ये लाइकेन्स अन्य नग्न चट्टानों (bare rocks) पर सोरीडिया (Soredia) अथवा अपने खण्डों के विकीर्णन के परिणामस्वरूप पहुँचते हैं। नग्न चट्टानों पर विकसित होने वाले प्रमुख कस्टोज लाइकेन्स राइजोकार्पान (Rhizocarpon), रिनोडिना (Rinodina), लेकानोरा (Lecanora), लेसिडिया (Lecidea) आदि हैं। ये लाइकेन्स चट्टानों का अपघटन (decomposition) करते हैं तथा चट्टान के कणों को अपनी मृत्यु से बने कार्बनिक पदार्थ जिसे ह्यूमस (humus) कहते हैं, में मिलाकर फोलियोज लाइकेन्स (foliose lichens) के विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियों का निर्माण करते हैं।

2. फोलियोज लाइकेन अवस्था (Foliose lichen stage)-क्रस्टोज लाइकेन्स (Crustose Lichens) के द्वारा शैलों (rocks) में लाये गये परिवर्तनों के कारण इन पर उपस्थित ह्यूमस युक्त मृदा में डर्मेटोकार्पान (Dermatocarpon), पार्मीलिया (Parmelia), अम्बिलिकेरिया (Umbilicaria) जैसे फोलियोज लाइकेन्स उद्भव (origin) होता है। इन फोलियोज लाइकेन्स के चौड़े सूकाय (thallus) क्रस्टोज लाइकेन्स पर छाया करते हैं और धीरे-धीरे उनका स्थान ले लेते हैं। अन्त में क्रस्टोज लाइकेन्स की मृत्यु हो जाती है, जिससे इनके अपघटन (decomposition) से ह्यूमस (humus) का निर्माण होता है तब स्रावित अम्ल शैल (rock) का अपघटन करते हैं। इन स्थानों पर पानी का संचय (Storage) तेजी से होता है तथा वाष्पीकरण की दर कम हो जाती है तथा धीरे-ध गरे मृदा की एक पतली परत का निर्माण हो जाता है। फोलियोज लाइकेन्स की मृत्यु से भी शैल (rock) पर ह्यूमस की मात्रा में वृद्धि होती है तथा निर्मित परिस्थितियाँ मॉस (mosses) जैसे पौधों की वृद्धि के लिए उपयुक्त हो जाती है।

3. मॉस अवस्था (Moss stage) — शैल स्तर (rock bed) पर मृदा के संचय के कारण शुष्कोदिभिद् मॉस (xerophytic mosses) के विकास के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ निर्मित होती है। यहाँ पर ग्रिमिया (Grimmia), पॉलिट्राइकम (Polytrichum) एवं टॉरदुला (Tortula) जैसे मॉस पौधों (moss plants) का विकास होता है। इन मॉस पौधों के बीजाणु (spores) हवा के माध्यम से अन्य स्थानों पर वितरित हो जाते हैं। ये मॉस शैल संस्तर (rock bed) के ऊपर मृदा की मात्रा में वृद्धि करते हैं। पुराने पौधों की मृत्यु एवं अपघटन (decay) के परिणामस्वरूप शैल संस्तर पर मृदा की एक मोटी चादर (mat) या स्तर का निर्माण होता है। इस स्तर में पानी धारण करने की क्षमता अधिक होती है तथा यह शाकीय पौधों (herbaceous plants) की वृद्धि के लिए उपयुक्त होती है।

4. शाकीय अवस्था (Herbaceous stage) मॉसेस के अत्यधिक वृद्धि के कारण चट्टान पर काफी मात्रा में मिट्टी का संकलन (formation) हो जाता है और इस बदले हुए आवास (Habitat) पर शाकीय पौधे, जैसे कि, पोआ (Poa), फेस्टुका (Festuca), ऐरिस्टिडा (Aristida) आदि में उगने लगते हैं। इन पौधों की जड़ें चट्टानों में प्रवेश कर उनमें दरार (crack) बढ़ाने के साथ उन्हें मिट्टी के कणों में बदलती है। यहाँ पर मृदा के ऊपर अत्यधिक छाया रहती है तथा पानी के वाष्पीकरण की दर अत्यन्त धीमी होती है। इन पौधों की मृत्यु एवं अपक्षय के परिणामस्वरूप मृदा के स्तर में वृद्धि होती है तथा यहाँ की परिस्थितियाँ अब झाड़ीनुमा पौधों के विकास के लिए उपयुक्त हो जाती है।

5. झाड़ी अवस्था (Shrub stage)—अब उपर्युक्त अवस्थाओं के आने के पश्चात् काफी अधिक मिट्टी का संकलन चट्टान पर हो जाता है, जिससे कि कुछ झाड़ी प्रकार के पौधे, जैसे-रहस (Rhush फाइटोकार्पस (Phytocarpus) यहाँ पर विकसित होते हैं। ये झाड़ियाँ शाकीय वनस्पति को ढक लेती हैं।

6. चरम अवस्था या वन अवस्था (Climax stage or Forest stage) इस तरह से बनी मरुस्थली परिस्थिति में अब धीरे-धीरे बड़े वृक्ष जैसे—ओक (Oak), मेपल (Maple), कोनिफर्स (Conifers) आदि वृद्धि करते दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे भूमि में नमी और वायु की आर्द्रता में वृद्धि होती है। अब वृक्ष अपेक्षाकृत ऊँचे तथा सघन होने लगते हैं। इन पौधों के नीचे छाया में सह तथा समोद्भिदी (mesophytic) वृक्षों की प्रजातियाँ उगने लगती हैं। धीरे-धीरे वृक्षों की संख्या में भी वृद्धि होती है। इन वृक्षों से ही चरम वनों (climax forests) का विकास होता है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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