मानव अधिकार की अवधारणा पर एक निबन्ध लिखिए।

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परम्परागत अंतर्राष्ट्रीय विधि को एक ऐसी विधि माना जाता था जो राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों को विनियमित करती थी। अतः यह विधि केवल राज्यों के क्रिया-कलापों से ही सम्बन्धित थी। यह मत इस अवधारणा पर आधारित था कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि के नियमों का सृजन राज्यों को दिया जाता है और उनके द्वारा बनाये गये नियम उन्हीं पर विधिमान्य हैं। इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय विधि के द्वारा अधिकतर अधिकार व कर्त्तव्य राज्यों के लिए ही बनाये गये थे। राष्ट्र ही अन्तर्राष्ट्रीय विधि के विषय थे। व्यक्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय विधि की दृष्टि से कोई महत्व नहीं था। वे नागरिकता या राष्ट्रीयता के माध्यम से केवल राज्यों से सम्बन्धित रहते थे और यदि वे दूसरे राज्यों में जाते थे तो अन्यदेशीय (Aliens) की भूमिका में राज्यों से सम्बन्धित रहते थे। यदि व्यक्तियों द्वारा कोई ऐसा कार्य किया जाता या जिससे किसी अन्य राज्य को हानि पहुँचाती थी तब उस व्यक्ति के कार्य के लिए यह राज्य हानि के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता था जिससे वह सम्बन्धित रहता था। यद्यपि व्यक्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अनुरूप विदेशी राज्यक्षेत्र पर कुछ अधिकार व कर्त्तव्य दिए गए थे, जैसे राज्याध्यक्षों और राजनयिक दूतों को। फिर भी उनको अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विषय नहीं माना जाता था। इन अधिकारों को धारण करने का आधार राष्ट्रीय विधि को माना जाता था न कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि को

अन्तर्राष्ट्रीय विधि में व्यक्तियों की स्थिति में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुत अधिक परिवर्तन हुआ। यह परिवर्तन अन्तर्राष्ट्रीय विधि में कई महत्वपूर्ण विकासों में से एक था। राज्यों के अतिरिक्त, अन्तर्राष्ट्रीय विधि में व्यक्तियों को कर्त्तव्य और अधिकार दिये जाने के कारण उनको अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विषय माना जाने लगा। यद्यपि इस पर कोई विवाद नहीं है कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि प्राथमिक रूप से राज्यों के सम्बन्ध को विनियमित करती है तथा राज्य ही अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विषय, उनको अधिकार अन्तर्राष्ट्रीय विधि द्वारा कर्त्तव्यों को राज्यों के साथ ही साथ व्यक्तियों को भी दिये जाते हैं। यह धारणा इसलिए है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय विधि में अपराध व्यक्तियों के द्वारा किये जाते हैं न कि राज्यों द्वारा।

अतः अन्तर्राष्ट्रीय विधि के नियमों का क्रियान्वयन व्यक्तियों को दण्डित करके हो सकता है जो अपराध करते हैं। ओपेनहाइम ने उचित ही कहा है कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि अब ऐसी विधि नहीं रह गई। है जो एकमात्र राज्यों से सम्बन्धित हो, जैसे यह पहले थी। इसके कई नियम प्रत्यक्षतः व्यक्तियों की स्थिति तथा क्रिया-कलापों को विनियमित करने से सम्बन्धित हैं और कई नियम अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें प्रभावित करते हैं। फिर भी अन्तर्राष्ट्रीय विधि में उसकी स्थिति इस कारण कमजोर है, क्योंकि इस विधि में उनको अधिकार एवं कर्त्तव्य केवल राज्यों के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है। अतः उनकी स्थिति राज्यों की इच्छा पर निर्भर करती है।

इसलिए व्यक्तियों को अन्तर्राष्ट्रीय विधि का व्युत्पन्न विषय (Derivative subject) कहा जाता है जबकि राज्यों को मूल विषय, क्योंकि वे विद्यमान विषय के किसी औपचारिक विनिश्चिय से

स्वतंत्र हैं, चूँकि राज्यों के द्वारा व्यक्तियों को कुछ ही अधिकार व कर्त्तव्य दिए गए हैं अतः वे अन्तर्राष्ट्रीय विधि से निर्बंन्धित व्यक्तित्व धारण करते हैं, जबकि राज्यों को पूर्ण अधिकार व कर्त्तव्य दिए जाने के कारण उनके पास असीमित व्यक्तित्व होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्विवाद हो गया कि अन्तर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा उसी समय बनी रह सकती है जब व्यक्तियों की स्थिति में सुधार हो तथा उनके अधिकारों व मूल स्वतंत्रताओं की अभिवृद्धि हो। इसी कारण व्यक्तियों को राज्यों द्वारा दिए गए कई अधिकारों में से एक अधिकार को मानव अधिकार (Human Rights) कहा जाता है जो आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय विधि का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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