जैव-विविधता एवं उसके संरक्षण पर एक निबन्ध लिखिए।

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जैव-विविधता के महत्व को देखते हुए यह आवश्यक है कि इसका संरक्षण किया जाये। इसके अत्यधिक उपयोग से बहुत सी जातियाँ लुप्तप्रायः स्थिति में आ चुकी हैं। विश्व की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है इसलिए इसकी आवश्यकता भी तेजी से बढ़ती जा रही है। इस कारण प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ पादप और जन्तुओं का भी मनमाना उपयोग किया जा रहा है जिससे जैव जातियाँ विलुप्त हो रही हैं। आज जिस तरह से इनका दोहन किया जा रहा है उसके आधार पर अगले कुछ वर्षों में लगभग एक-तिहाई प्रजातियाँ समाप्त हो जायेंगी। पादप जातियों के विलुप्त होने का कारण अत्यधिक वन कटाई है। एक अध्ययन के अनुसार प्रति वर्ष लगभग 5 से 10% वनों की अवैध कटाई होती है। इसी प्रकार प्राणियों के विलुप्त होने का अन्य कारण है-अवैध शिकार। इसके अलावा विलुप्त होने का एक और कारण है-वातावरण में बढ़ता प्रदूषण प्रदूषण के कारण पादप एवं प्राणियों को जीवन-यापन के लिये अनुकूल वातावरण नहीं मिलता जिससे उनकी जाति-प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं।

IUCN की संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका है। विशेष रूप से यह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के बीच समन्वयक (Coordinator) की भूमिका निभाता है। IUCN के पाँच वर्ग जो संरक्षण के लिये बनाये गये थे उसका उपयोग विश्व संरक्षण मॉनीटर केन्द्र (World Conservation Monitoring Centre) ने किया और लगभग 60,000 पादप और 2,000 प्राणियों की जाति को खतरों से चिह्नांकित किया इन प्राणियों का वर्णन जिस पुस्तक में किया उसे रेड डाटा बुक (Red Data Book) के नाम से जाना जाता है। रेड डाटा बुक में प्रकाशित जातियों की बैटेन्ड जाति (Threatened Species) का नाम दिया गया। IUCN के तीन वर्ग संकटापन्न (Endargered), सुभेद्य (Vulnerable) एवं दुर्लभ (Rare) इस ब्रैटेन्ड जातियों के अन्तर्गत आते हैं। रेड डाटा बुक में पादप जातियों का वर्णन अधिक है लेकिन कुछ प्राणी समुदाय भी इसके अन्तर्गत आते हैं, जैसे-मछली, जिनकी जातियों की संख्या 343 है, उभयचर जिनकी जातियों की संख्या (50), इसी प्रकार सरीसृप (170), अकशेरुकी (1355), पक्षी (1037) एवं स्तनधारियों की (497) जातियाँ शामिल हैं। इसके पश्चात् IUCN ने 1978 में IUCN प्लांट रेड डाटा बुक ((IUCN) Plant Red Data Book) का प्रकाशन किया और सन् 1988 में “IUCN रेड डाटा लिस्ट ऑफ सैटेन्ड एनीमल्स” ((IUCN) Red Data List of Threatened Animals] का प्रकाशन किया।

बुकलेट (Booklet) Threatened Plant of India – A State of the Art Report” के नाम से प्रकाशित किया BSI की योजना PL-480 के प्रारम्भ होने के बाद से हमारे देश में जैव-विविधता के संरक्षण पर गम्भीरतापूर्वक कार्य किया। इस योजना के निष्कर्ष के आधार पर BSI ने 125 डाटा शीट (Data Sheet) की एक पुस्तक 1984 में प्रकाशित की इसका नाम या “The Indian Plant Red Data Book-I”

संरक्षण की विधियाँ (Methods of Conservation) ” संरक्षण का प्रयास विश्व स्तर पर किये तो जा रहे हैं लेकिन संरक्षण की निश्चित नीति होती है • जिसके आधार पर जैव-विविधता का संरक्षण किया जाता है। जैव-विविधता को जिस प्रकार तीन भागों में विभाजित किया गया है उसी के आधार पर संरक्षण की भी तीन विधियों विकसित की गई है (1) प्रजाति विविधता का संरक्षण (Conservation of Species Diveraity),

(2) आनुवंशिक विविधता का संरक्षण (Conservation of Genetic Diversity), (3) पारिस्थितिकीय तन्त्रीय विविधता का संरक्षण (Conservation of Ecological Diversity)

उपर्युक्त तीनों प्रकार की विविधताओं का संरक्षण निम्नलिखित दो विधियों द्वारा किया जाता है

(1) इन-सिटू संरक्षण (In-situ Conservation), (2) एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ Conservation) |

I. इन-सिटू संरक्षण

(In-situ Conservation )

इन-सिटू संरक्षण का अर्थ इस शब्द में ही अर्थात् ऐसा संरक्षण जो उस स्थान में हो जहाँ पादप या प्राणी पाये जाते हैं। दूसरे शब्दों में, जीवों (पादप एवं जन्तु) के मूल आवास में ही यदि उनको संरक्षित किया जाये तो वह इन-सिटू संरक्षण (In-situ Conservation) कहलाता है। उदाहरण के लिए, कुछ प्राणी किसी निश्चित वन में पाये जाते हैं तो उन प्राणियों का संरक्षण उनके उसी प्राकृतिक आवास में कर दिया जाता है तो यह इन-सिटू संरक्षण कहलाता है। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय उद्यान, ●अभयारण्य इत्यादि आते हैं।

इन-सिटू संरक्षण में पादपों और जीवों को उनके आवास स्थानों में ही संरक्षित किया जाता है।

इन संरक्षित क्षेत्रों को उनकी श्रेणियों तथा विभिन्न विकल्पों के आधार पर अलग वर्गों में विभाजित किया गया है। ये हैं

(1) राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)

(2) अभयारण्य (Sanctuaries)

(3) जीव-मण्डलीय आरक्षण (Biosphere Reserves) (4) प्राकृतिक आरक्षण (Natural Reserves)

(5) प्राकृतिक स्मारक (Natural Monuments)

(6) सांस्कृतिक दृश्यभूमि (Cultural Landscapes) इत्यादि।

II. एक्स-सिटू संरक्षण (Ex-situ Conservation)

एक्स-सिटू संरक्षण का अर्थ है-आवास के बाहर संरक्षण अर्थात् पादप या प्राणियों की विभिन्न जातियों या जैव-विविधता का संरक्षण उनके मूल आवास से दूर ले जाकर किसी संरक्षित क्षेत्र, स्थल या प्रयोगशाला में किया जाता है तो उसे एक्स-सिद्ध संरक्षण (Ex-situ Conservation) कहते हैं। अतः एक्स-सिटू संरक्षण प्राकृतिक आवास में भी किया जा सकता है और प्रयोगशाला में भी किया जा सकता है।

एक्स-सिटू संरक्षण के संरक्षित क्षेत्र (Conservative Region for Ex-situ Conservation) प्राकृतिक आवासों में एक्स-सिटू संरक्षण निम्न विधियों द्वारा किया जा सकता है

(1) वानस्पतिक उद्यानों की स्थापना द्वारा वानस्पतिक उद्यानों की स्थापना एक निश्चित स्थान पर की जाती है एवं जिस पादप को संरक्षित करना होता है उसके अनुकूल आवास वहाँ बनाये जाते हैं और उन्हें वहाँ उगाया जाता है। इस प्रकार विभिन्न आवास स्थानों की जातियों को एक स्थान पर लाकर उनका संरक्षण किया जाता है।

(2) प्राणि उद्यान (Zoo) की स्थापना द्वारा जिस प्रकार पौधों को वानस्पतिक उद्यान में लगाया जाता है वैसे ही संरक्षित प्राणी को प्राणि उद्यान में रखकर उसके भोजन, प्रजनन इत्यादि की व्यवस्था कर उसे संरक्षित किया जाता है।

(3) कृषि अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा-कृषि से सम्बन्धित पादप अर्थात् फसलों को विभिन्न कृषि अनुसन्धान संस्थाएँ विकसित कर उनका संरक्षण करती है।

(4) वानिकी अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा वानिकी अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा रोपणी बनाकर संरक्षित जातियों की संख्या बढ़ाई जाती है जिससे उनका संरक्षण हो सके। प्राकृतिक आवास के अलावा प्रयोगशाला में भी एक्स-सिटू संरक्षण किया जाता है जिसकी विधियाँ निम्नानुसार है

(1) बीज बैंक (Seed Bank)-बीजों को लम्बी अवधि तक संरक्षित रखना। (2) जीन बैंक (Gene Bank)- इसके अन्तर्गत जननद्रव्य का संग्रह किया जाता है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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