भारत में वर्षा जल संग्रहण तथा जल विभाजक प्रबन्धन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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वर्षा जल संग्रहण से आशय वर्षा जल के अधिकांश भाग को जमीन के अन्दर भूमिगत जल के रूप में भण्डारण करने से है। वस्तुतः धरातल पर प्राप्त होने वाले वर्षा जल मानव-उपयोग की दृष्टि से संरक्षित करने सम्बन्धी समस्त उपाय वर्षा जल संग्रहण या वर्षा जल खेती के अन्तर्गत आते हैं। ऐसी स्थिति में जब जलसंकट की समस्या विश्वस्तर पर गम्भीर होती जा रही है तथा विश्व के विभिन्न भागों में जल आपूर्ति को लेकर विवाद व संघर्ष उत्पन्न हो रहे हो तो ऐसी स्थिति में वर्षा जल संग्रहण का सर्वोत्तम एवं सफलतम तकनीक है।

धरातल पर प्राप्त होने वाले वर्षा जल का एक बड़ा भाग प्रतिवर्ष व्यर्थ बहकर नदियों के माध्यम से महासागरों में पहुँच जाता है, दूसरी ओर देश में बढ़ते नगरीकरण, कम होते वन क्षेत्र, भूमि व भूमिगत जल के अतिविदोहन तथा जल संरक्षण एवं प्रबन्धन के अभाव से भूमिगत जल का स्तर प्रतिवर्ष विश्व के अधिकांश भागों में तेजी से गिरता जा रहा है। यही नहीं, विश्व के कुछ भागों में तो भूमिगत जल के भण्डार अतिविदोहन के कारण समाप्त हो चुके हैं। वर्षा जल प्रबन्धन एक ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से धरातल पर प्राप्त होने वाले वर्षा जल का अधिकतम भाग मानवीय उपयोग के लिए संरक्षित एवं सुरक्षित रखने के प्रयास किये जाते हैं। विश्व के नगरीय तथा महानगरीय क्षेत्रों के अधिकांश भू-भाग पर तारकोल अथवा सीमेण्ट की परत बिछी होती है। जमीन पर खेतों व वृक्षों के स्थान पर सीमेण्ट-कंक्रीट के जंगल खड़े होने से स्थिति यह हो गयी है कि नगरीय क्षेत्रों में ऐसे खुले भू-भागों का अभाव हो गया है जहाँ से वर्षा जल भूमि के अन्दर प्रवेश कर सके। अतः नगरीय तथा महानगरीय क्षेत्रों में वर्षा जल संग्रहण जैसे अभियानों की विशेष आवश्यकता है।

भारत के नगरीय तथा महानगरीय क्षेत्रों में गम्भीर होते जा रहे जलसंकट से छुटकारा पाने के लिए भारत सरकार तथा स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर वर्षा जल संग्रहण तकनीक को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयासरत हैं। दिल्ली महानगर में सन् 2000-2001 में शुरू किये गये वर्षा जल संग्रहण अभियान में सरकारी तथा गैर सरकारी प्रयासों को पर्याप्त सफलता मिली है। अगस्त 2004 में दिल्ली महानगर में वर्षा जल संग्रहण प्लांट की संख्या एक हजार से अधिक हो गयी है।

छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश सरकार द्वारा घटते भूमिगत जल स्तर के नियन्त्रण हेतु रूफ वाटर हार्वेस्टिंग से सम्बन्धित निम्न विज्ञप्ति जनहित में समय-समय पर समाचार-पत्रों में विज्ञापित की जाती रही है। वर्षा जल संग्रहण प्रणाली के अन्तर्गत निम्नलिखित 4 अंग सम्मिलित हैं (1) वर्षा जल संग्रहण, (2) वर्षा जल भण्डार, (3) जल का वितरण, (4) प्रणाली का रखरखाव ।

हमें वर्षा जल संग्रहण में घरों की छतों, सड़कों तथा अन्य अभेद्य सतह वाले क्षेत्रों के संग्रहण के लिए छोटी-छोटी नालियों, प्लास्टिक टैंकों तथा पाइपों का उपयोग करना होता है। इस प्रणाली के द्वारा वर्षा जल को गाँव के सूखे कुओं तथा शुष्क तालाबों में संग्रहित करने के सार्थक प्रयास तो होते हैं, साथ ही अपने घरों के समीपवर्ती क्षेत्र के वर्षा जल को व्यर्थ के प्रवाहित होने से रोकने के लिए विभिन्न उपाय भी वर्षा जल संग्रहण पद्धति में सम्मिलित किये जाते हैं।

रिचार्ज पिट द्वारा वर्षा जल संग्रहण (Rain Water Harvesting Through Recharge Pit) इस विधि में घर में 8-10 मीटर की दूरी पर धरातल के समीप 1 से 2 मीटर चौड़ा तथा 2 से 3 मीटर गहरा गड्ढा या रिचार्ज पिट बना दिया जाता है। इस पिट की तली पर रेत, बालू तथा गिट्टी की मोटी परत बिछा दी जाती है। घर की छत से पाइप बिछाते हुए उसका सम्पर्क इस रिचार्ज पिट से कर दिया जाता है। वर्षा होने पर घर की छतों की समस्त वर्षा जल पाइप के माध्यम से इस रिचार्ज पिच में आ जाता है तथा बाद में इस भूगर्भ में पहुँचकर भूमिगत जल स्तर में वृद्धि करता है।

भारत में वर्षा जल संग्रहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति करने वाले राज्यों में दिल्ली के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात तथा हरियाणा सम्मिलित हैं।

जल विभाजक से आशय (Water Separator)

जल विभाजक वह समस्त क्षेत्र होता है, जो अपने क्षेत्र में प्रवाहित जल को एक जलधारा में अपवाहित करता है।

यदि एक जल विभाजक का समस्त भाग प्राकृतिक वनों या घास क्षेत्रों से आच्छादित है तथा धरातलीय ऊपरी सतह पर प्रवेश्य चट्टानें तथा उर्वरक मिट्टियों रखता है, तो ऐसे जल विभाजक क्षेत्र में प्राप्त वर्षा जल का अधिकांश भाग मिट्टी द्वारा अवशोषित कर भूमिगत जल के रूप में संग्रहित हो जाता है, जबकि वनों अथवा घास क्षेत्रों का अभाव तथा धरातल पर अप्रवेश्य चट्टानों व अनुपजाऊ मिट्टियों की उपस्थिति होने पर वर्षा द्वारा धरातल पर प्राप्त जल का अधिकांश भाग व्यर्थ बहकर चला जाता है। किसी भी प्रदेश के जल विभाजक क्षेत्र में वनीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि इससे नदियों का जल प्रवाह नियन्त्रित रहता है।

वर्तमान में मानव के अनेक क्रियाकलापों ने भी धरातलीय सतह की प्रकृति को परिवर्तित कर दिया है, जिससे धरातल जल के रिसाव अथवा अवशोषण तथा बहाव का अनुपात परिवर्तित होकर कम रिसाव तथा अधिक बहाव के रूप में हो जाता है। भारत के नगरीय क्षेत्रों में भवनों की सघनता, पक्की सीमेण्टेड व कोलतार निर्मित सड़कें तथा अधिकतम खुले क्षेत्रों पर पक्के फर्शो के निर्माण से इन क्षेत्रों में वर्षा जल अवशोषण की मात्रा तेजी से घटी है,

क्योंकि ऐसे क्षेत्रों को प्राप्त होने वाले वर्षा जल का अधिकांश भाग व्यर्थ बहकर नालों तथा नदियों में चला जाता है। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि भारत के नगरीय तथा महानगरीय क्षेत्रों में भूमिगत जल के भण्डार तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं, जिससे इन क्षेत्रों में पेयजल का गम्भीर संकट उत्पन्न हो गया है।

जल विभाजक प्रबन्धन के अन्तर्गत वे सभी उपाय सम्मिलित हैं, जिसके द्वारा एक जल विभाजक क्षेत्र के भूमिगत व जलीय भण्डारों की पर्याप्त उपलब्धता कायम रहे।

जल विभाजक प्रबन्ध के प्रमुख उद्देश्य (The Main Objectives of Water Separator)

(i) जल एवं मृदा संरक्षण, (ii) चरागाहाँ एवं वन क्षेत्रों का विकास करना, (iii) बाढ़ नियन्त्रण, (iv) कृषि अयोग्य भूमि का समुचित उपचार करना, (v) आवश्यकतानुसार संसाधनों के समन्वित विकास के लिये समुचित रणनीति को लागू करना, (vi) सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सीमित जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग कर कृषि उत्पादन में वृद्धि करना।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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