अनवीनीकरण ऊर्जा संसाधन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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अनवीनीकरण ऊर्जा संसाधन (Non-renewable Energy Resources)

इसके अन्तर्गत ऐसे ऊर्जा संसाधनों को सम्मिलित किया गया है जिनका नवीनीकरण सम्भव नहीं होता है। उदाहरण-कोयला, पेट्रोलियम गैस एवं आण्विक ईंधन (1) कोयला Coal

कोयला एक नवीनीकरण अयोग्य जीवाश्म ईंधन (Fossil fuel) है। प्राचीनकाल में पृथ्वी के विभिन्न भागों में सघन दलदली वन ये जो भूगर्भीय हलचलों के कारण भूमि में दब गये। कालान्तर में दलदली वनस्पति ही कोयले में परिवर्तित हो गई। क्रमशः ऊपर की मिट्टी कीचड़ आदि के भार से तथा भूगर्भ के ताप से उस दबी हुई वनस्पति ने कोयले की परतों का रूप ले लिया। करोड़ों वर्षों के बाद बहुत से क्षेत्रों में उत्थान होने और शैलों के अनाच्छादित होने के कारण, कोयले की भूमिगत परतें पृथ्वी की ऊपरी सतह पर दिखलाई देने लगी।

कोयले के प्रकार (Types of Coal)

कोयले में कार्बन तत्व की मात्रा के अनुसार ऊर्जा क्षमता होती है। गुणों के आधार पर कोयले की निम्नलिखित मुख्य किस्में होती है-

(1) ऐन्थ्रेसाइट (Anthracite) यह कोयला सर्वोत्तम प्रकार का बहुत कठोर, चमकदार, वेदार और भंगुर (brittle) होता है। इसमें कार्बन की मात्रा 90% 96% होती है तथा वाष्पशील पदार्थ बहुत कम होता है, अतः इसके जलने से धुआँ बहुत कम होता है और ताप बहुत अधिक होता है।

(2) बिटुमिनस (Bituminous) कोयला—इस कोयले में कार्बन की मात्रा 70%-90% होती है। यह काले रंग का, चमकदार, हाथ काले करने वाला कोयला है। इसमें वाष्पशील पदार्थ की मात्रा बहुत अधिक होती है, अतः यह कोयला जलाने में बहुत धुआँ देता है तथा पीली लौ के साथ जलता है। इसमें राख का अंश भी अधिक होता है।

(3) लिग्नाइट या भूरा कोयला (Lignite or brown coal)-लिग्नाइट कोयले में कार्बन की मात्रा 45%-70% होती है। यह प्रायः भूरे रंग का होता है। यह जलने में बहुत धुआँ देता है तथा राख भी बहुत छोड़ता है। यह एन्वेसाइट तथा बिटुमिनस की अपेक्षाकृत नवीन कोयला है, इसमें वनस्पति का अंश अधिक मात्रा में होता है। (4) पीट कोयला (Peat Coal)-आयु के विचार से यह सबसे नवीन कोयला होता है और वनस्पति के मौलिक रूप से यह थोड़ा ही भिन्न होता है। इसमें 55% कार्बन, 35% ऑक्सीजन और 10% हाइड्रोजन होती है। यह प्रायः लकड़ी की तरह जलता है और जलने में बहुत धुआँ देता है। इसका अधिकतर प्रयोग घरों में जलाने के लिए किया जाता है। पूर्व सोवियत संघ में पीट कोयले से ताप

विद्युत उत्पादन किया जाता है। कोयल के उपयोग-कोयला संसार में शक्ति का मुख्य संसाधन है और हमारी वर्तमान सभ्यता इस पर आधारित है। कोयले का प्रयोग लोहा-इस्पात उद्योग, मशीन निर्माण, रेल के इंजनों, जलपोत निर्माण, सीमेण्ट बनाने और चूना फूँकने की भट्टियों, काँच गलाने और ईंट पकाने के भट्टों में, धातु गलाने की भट्टियों, वस्त्र उद्योग, चीनी बनाने की मिलों, कागज लुग्दी, विद्युत के शीतगृहों इत्यादि में ईंधन के रूप में किया जाता है।

कोयले का संरक्षण (Conservation of Coal)-कोयले का संरक्षण निम्न प्रकार किया जा सकता है

(1) कोयला खनन की अनुपयुक्त विधियों के द्वारा बहुत-सी मात्रा का क्षय होता है, उसे यथासम्भव कम करना चाहिए।

(2) जिन कारखानों, फैक्ट्रियों, निर्माणशालाओं और इंजन आदि की भट्टियों में कोयला जलाया जाता है, उनमें कोयला जलाने की दक्षता को अधिकाधिक बढ़ाया जाना चाहिए।

(3) कोयले से कोक का निर्माण करने में भी कोयले की कुछ मात्रा क्षयित (waste) हो जाती है। इसको यथासम्भव दूर किया जाना चाहिए।

(4) जिन भाप के इंजनों में और स्टीम टर्बाइनों में अभी तक भाप बनाने की पुरानी प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है, उनकी दक्षता में सुधार होना आवश्यक है।

(2) पेट्रोलियम (Petroleum) ऊर्जा के संसाधनों में पेट्रोलियम (petra = शैल, oleum = तेल) अर्थात् खनिज तेल का महत्व बहुत अधिक व्यापक है। कोयले की अपेक्षा पेट्रोलियम हल्का होता है तथा इसमें ताप देने की शक्ति कोयले से कई गुना अधिक होती है।

पेट्रोलियम की उत्पत्ति अभी तक संदिग्ध है। वैज्ञानिकों का सामान्य मत है कि अतीत काल में सागरीय जीवों और प्लॅकटन जैसी अति लघु वनस्पति के भूमि में दबने के बाद, वह जैव पदार्थ जीवाण्विक क्रिया (bacteriological) द्वारा अपघटित हो गया था, उसके पश्चात् रासायनिक परिवर्तन द्वारा वह पदार्थ तल के लघु कणों का रूप धारण कर गया। ऊपरी शैलों के भार से दबकर वे तेल कण परतों में एकत्रित होते रहे। भूपटल की केवल अवसादी शैलों में ही खनिज तेल मिलता है। तलछटी मैदानों में समुद्रतटों में और उथले समुद्रों के अन्दर भी तेल मिलता है। तेलकूप खोदकर तेल को बाहर निकाला जाता है।

पेट्रोलियम के मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं-

(1) घरेलू ईंधन के रूप में रसोईघरों में, प्रकाश देने के लिए और ठण्डे देशों में मकानों को गर्म करने के लिए। (2) औद्योगिक ऊर्जा के रूप में कारखानों के इंजनों को चलाने के लिए, भट्टियों को ताप देने के लिए तथा ताप विद्युत उत्पादन के लिए।

(3) परिवहन शक्ति के रूप में रेलगाड़ियों, मोटरगाड़ियों, जलयानों, वायुयानों को चलाने के लिए। (4) मशीनों को विशेषतः तेज गति से चलने वाले पुर्जों को चिकना बनाये रखने के लिए स्नेहक (lubricant) के रूप में है।

(5) रासायनिक उद्योगों में कच्चे माल की तरह प्रयोग करने के लिए। इससे (i) कृत्रिम रबर बनाई जाती है, जिससे ट्यूब टायर, बैल्ट आदि निर्मित होते हैं, (ii) अनेक प्रकार के कृत्रिम रेशे बनाये जाते हैं, जिनसे टेरीलीन वस्त्र आदि निर्मित होते हैं, (iii) कृषि के उर्वरक बनाये जाते हैं, (iv) विभिन्न प्रकार के दूसरे तेल, तथा (v) औषधियाँ बनाई जाती हैं।

पेट्रोलियम से अब 5,000 से भी अधिक वस्तुओं का उत्पादन हो रहा है। • विश्व में पेट्रोलियम के भण्डार-संसार में तेल के ज्ञात भण्डार सबसे अधिक फारस की खाड़ी के समीपवर्ती पश्चिमी एशिया के अरब राज्यों में हैं, जिनको ‘मध्य पूर्व’ कहते हैं। इनमें विश्व के पेट्रोलियम भण्डार का लगभग 60% भाग है। इनके समीप पूर्व सोवियत संघ के पेट्रोलियम भण्डार है। कैस्पियन सागर, काला सागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी से घिरा हुआ भूखण्ड संसार का सर्वप्रमुख पेट्रोलियम भण्डार है। अन्य बड़े भण्डार संयुक्त राज्य अमेरिका, केरीबियन सागरीय प्रदेश तथा उत्तरीय अमेरिका के अल्जीरिया और लीबिया राज्य हैं। इण्डोनेशिया, चीन, भारत, जापान, म्यांमार तथा आस्ट्रेलिया में भी खनिज तेल के छोटे-छोटे भण्डार हैं।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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