मरुस्थलीकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

0
26

मरुस्थलीकरण (Desertification)

मरुस्थलीकरण में मरुस्थल का निर्माण होता है। यह या तो जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्राकृतिक परिघटना के कारण होता है या गलत भूमि उपयोग के कारण। वास्तव में जलवायु परिवर्तन के लिए भी ये अनुचित भूमि उपयोग पद्धति है जो ज्यादातर इसके लिए जिम्मेदार है। वनस्पति आवरण के निष्कासन से क्षेत्र की स्थानीय जलवायु में विशिष्ट परिवर्तन होते हैं। इस प्रकार वनोन्मूलन, अतिचारण, वृष्टि, तापमान, वायु वेग इत्यादि में परिवर्तन लाते हैं और साथ ही मृदा अपरदन करते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन फिर क्षेत्र के मरुस्थलीकरण (desertification) का कारण होते हैं। मरुस्थलीकरण प्रायः उत्पादक भूमि के खण्डमय विनाश से शुरू होता है। वातावरण में वृद्धित धूल कण मरुस्थलीकरण (desertification) करते हैं और कटिबन्ध (zones) के किनारे जहाँ आर्द्र नहीं होते, सूखा उत्पन्न करते हैं। यहाँ तक कि आर्द्र कटिबन्ध (humid zones) भी वर्धमान सूखा होने के खतरे में पड़ जाते है। यदि सूखा कई वर्षों तक लगातार पड़ता रहे संकेत स्पष्ट है कि भारत में मौसम सम्बन्धी सूखे (metereological drought) की अस्थायी परिघटना स्थायी होती जा रही है। यह प्रवृत्ति वर्तमान मरुस्थल के झल्लरी तक सीमित नहीं है। इस प्रकार मरुस्थलीकरण की धमकी असली है क्योंकि जैसे ही वन हासित होंगे, वातावरणीय तापमान में स्थिर उछाल आ जायेगा।

यह गलत नहीं है कि पिछले दो दशकों के दौरान मनुष्य द्वारा वन और अन्य पारिस्थितिक तन्त्र को अधिक क्षति पहुँचाई गई है। देश में आजादी के समय 750 लाख हेक्टेयर लगभग 22% वन आवरण के अन्तर्गत था। आज यह घटकर लगभग 10% तक रह गया है। भारत में प्रत्येक 24 घण्टों में 100 लाख पेड़ों का हनन होता है। इस प्रकार वनोन्मूलन मरुस्थलीकरण (desertification) का एक महत्वपूर्ण कारक है, प्राथमिकतः इसका प्रभाव क्षेत्र की जलवायु पर पड़ता है।

सूखे का प्रतिघात समाज-सांस्कृतिक वातावरण पर महत्वपूर्ण है। सबसे स्पष्ट सम्मुख प्रतिघात प्रभावित क्षेत्र की पशु और मनुष्य जनसंख्या के स्वास्थ्य पर होता है। जल निम्नता के परिणामस्वरूप जल रोगों की ज्यादा घटनाएँ होती हैं और जबकि सूखा अस्थाई परिघटना है, मरुस्थलीकरण (desertification) नहीं।

मरुस्थलीकरण के कारण मरुस्थलीकरण (desertification) के महत्वपूर्ण कारण है (i) जलवायु कारक, (ii) मानवीय कारक (मानव संस्कृति) भूमि उपयोग और जनसंख्या घनत्व के हाल ही परिवर्तन के बहुत पारिस्थितिकीय प्रभाव हैं। मानवीय कारक हैं-जनसंख्या वृद्धि और बढ़ता घनत्व, निम्न यायावरता (nomadism) और चारण भूमियों का हनन, (iii) जलवायु और संस्कृति के बीच अन्योन्य क्रिया

वनोन्मूलन और अनाच्छादन (denudation) के कारण ज्ञात हैं। प्रमुख कारण है-मनुष्य और पशुधन में जनसंख्या विस्फोट, जिससे टिम्बर (timber), ईंधन और चारण की माँग बढ़ रही है। पशुधन और गतिशील पशुचारण वनों के निम्नीकरण (degradation) और अनुवर्ती उजड़ने में भाग लेते हैं। सबसे ज्यादा पहुँच के भीतर का वन्य क्षेत्र अत्यधिक चारित होता है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here