ऊर्जा संसाधन से क्या तात्पर्य है ? उसके परम्परागत और वैकल्पिक स्रोतों का वर्णन कीजिए।

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वैकल्पिक या गैर-परम्परागत ऊर्जा के स्रोत (Traditional and Alternative Sources of Energy)

सवित भण्डार आगामी 35 वर्षों में पूर्णतया समाप्त हो जायेंगे। ऐसी स्थिति में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के विकास के लिये विश्व स्तर पर प्रयास किये जा रहे है। ऊर्जा के ऐसे वैकल्पिक स्रोतों को गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोत भी कहा जाता है। भविष्य में मानव को अपने आर्थिक विकास के स्तर को कायम रखने के लिए ऊर्जा के इन वैकल्पिक स्रोतों का विकास करना एक अनिवार्यता है।

• वर्तमान में निम्न गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का उपयोग व विकास किया जा रहा है 1. सौर ऊर्जा-सूर्य से प्राप्त ऊर्जा असीम होती है। विभिन्न स्रोतों से मानव ने जितनी ऊर्जा का उपयोग पिछले दस लाख वर्षों में किया है, उतनी ऊर्जा सूर्य से पृथ्वी पर एक दिन में प्राप्त हो जाती है। विश्व में सूर्यातप से ऊर्जा उत्पादित करने के लिये सौर फोटोबाल्टिक विधि का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा सौर वाटर हीटर, सौर कुकर तथा सौर ड्रायर जैसे उपकरणों का उपयोग भी सौर ऊर्जा प्राप्त करने के लिये बढ़ रहा है। यही नहीं, इजराइल जैसे देशों में सौर ऊर्जा प्राप्त करने के लिये जलीय भागों की सतह पर नमक की परत बिछाकर सौर ताप का संग्रह सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

1. सौर ऊर्जा-सूर्य से प्राप्त ऊर्जा असीम होती है। विभिन्न स्रोतों से मानव ने जितनी ऊर्जा का उपयोग पिछले दस लाख वर्षों में किया है, उतनी ऊर्जा सूर्य से पृथ्वी पर एक दिन में प्राप्त हो जाती है। विश्व में सूर्यातप से ऊर्जा उत्पादित करने के लिये सौर फोटोबाल्टिक विधि का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा सौर वाटर हीटर, सौर कुकर तथा सौर ड्रायर जैसे उपकरणों का उपयोग भी सौर ऊर्जा प्राप्त करने के लिये बढ़ रहा है। यही नहीं, इजराइल जैसे देशों में सौर ऊर्जा प्राप्त करने के लिये जलीय भागों की सतह पर नमक की परत बिछाकर सौर ताप का संग्रह सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

सौर ऊर्जा के विकास की अभी असीम सम्भावनाएँ हैं तथा मानव इस ऊर्जा का बहुत कम भाग ही अभी तक विकसित कर पाया है। इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य में जब भूगर्भ का अधिकांश कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस पूर्णतया समाप्त हो जायेंगे तो विश्व की ऊर्जा माँग का अधिकांश भाग सौर ऊर्जा से ही पूरा हो सकेगा। घरों में विद्युत, खेतों में सिंचाई तथा दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा का उपयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। वर्तमान में सौर ऊर्जा के उत्पादन से सम्बन्धित विभिन्न सामग्रियों का महँगा होना सौर ऊर्जा के विकास में अवरोध है। सूर्यातप का असमान वितरण तथा वर्षपर्यन्त सूर्यातप प्राप्त होने अनिश्चितता सौर ऊर्जा उत्पादन की अन्य बाधाएँ हैं। भारत में राजस्थान के जोधपुर जिले के मथानियाँ गाँव तथा उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कल्याणपुर गाँव तथा मऊ जिले के सरायसादी स्थान पर सौर विद्युतगृह की स्थापना की जा चुकी है।

2. पवन ऊर्जा-यह ऊर्जा का नवीनीकरण योग्य, स्वच्छ व सुरक्षित स्रोत है। भू-पटल के उन भागों में जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र गति से हवाएँ चलती हैं, वहाँ हवा मिलें या पवन पम्प स्थापित कर वायु ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। तीव्र हवा के कारण हवा मिलों या पवन पम्पों में लगा बड़ा पहिया तेजी से घूमने लगता है। पहिये की इसी तीव्र घूर्णन गति से वायु ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है। वायु ऊर्जा का उत्पादन केवल सीमित क्षेत्रों में सम्भव होता है तथा इससे सतत् रूप से ऊर्जा प्राप्त करने में समय-समय पर अवरोध (तीव्र वायु प्रवाह न होने की स्थिति में) उत्पन्न होता रहता है। भारत में राजस्थान व गुजरात राज्यों के विभिन्न भागों में पवन पम्प तथा पवनचक्कियों स्थापित की गयी हैं। जर्मनी, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा डेनमार्क विश्व में वायु ऊर्जा उत्पादन करने वाले अग्रणी देश हैं।

3. ज्वारीय ऊर्जा-गैर-परम्परागत ऊर्जा स्रोतों में ज्वारीय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है। यह ऊर्जा सागरीय जल में उत्पन्न ज्वार-भाटे से उत्पन्न की जाती है। इस ऊर्जा का उत्पादन प्रायः ज्वारदनमुख अथवा सॅकरी सागरीय खाड़ियों पर किया जाता है। ज्वार के समय सागरीय जल खाड़ी में भर जाता है। इस जल को ऊँचा जलाशय निर्मित कर संग्रह कर लिया जाता है। जहाँ से इस जल को टरबाइन पर तीव्र गति से डालकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।

विश्व का सबसे पहला ज्वारीय विद्युतगृह सन् 1966 में फ्रांस में नदी के मुहाने पर स्थापित किया गया। वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन तथा अर्जेन्टाइना देश ज्वारीय ऊर्जा

उत्पादित करने वाले प्रमुख देशों में सम्मिलित है। भारत में 900 मेगावाट उत्पादन क्षमता की कच्छ ज्वारीय विद्युत परियोजना गुजरात के कच्छ तटीय क्षेत्र में कार्यरत है।

4. भूतापीय ऊर्जा-भू-गर्भ में मैगमा या रेडियोधर्मी तत्वों के विखण्डन से जब वहाँ का तापक्रम अधिक बढ़ जाता है तो भू-सतह के ठीक नीचे स्थित चट्टानें भी गर्म हो जाती हैं। इन चट्टानों द्वारा जो ऊर्जा निकलती है, उसे भूतापीय ऊर्जा कहा जाता है। इस ऊर्जा को विद्युत में परिवर्तित कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाया जा सकता है। इस ऊर्जा में पहले जल को गर्म कर वाष्प में

बदला जाता है तथा बाद में इसी वाष्प की सहायता से टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पादित की जाती है। भूतापीय ऊर्जा सस्ता, स्वच्छ तथा न समाप्त होने वाला ऊर्जा स्रोत है। विश्व में सबसे पहले भूतापीय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन करने का कार्य इटली के लारडरलो नामक स्थान पर प्रारम्भ हुआ। भारत के जम्मू-कश्मीर व महाराष्ट्र राज्यों में भूतापीय ऊर्जा उत्पादन प्राप्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं।

5. बायोगैस ऊर्जा-बायोगैस का निर्माण पशुओं के गोबर, कूड़े-करकट, मल-मूत्रादि की सहायता से किण्वन विधि द्वारा किया जाता है। बायोगैस एक रंगहीन तथा ज्वलनशील गैस होती है जिसमें लगभग 60% मीथेन तथा 30% कार्बन डाइऑक्साइड गैस होती है। इस गैस का उपयोग भोजन बनाने, प्रकाश प्राप्त करने तथा अन्तर्दहन इन्जनों के संचालन में किया जाता है। लैटिन अमेरिकी देशों, अफ्रीका तथा सुदूर-पूर्व के देशों में बायोगैस ऊर्जा का उत्पादन प्रमुख रूप से किया जा रहा है। भारत में मार्च 1992 तक लगभग 16 लाख बायोगैस प्लाण्ट स्थापित किये जा चुके हैं तथा वर्तमान में इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। बायोगैस ऊर्जा उत्पादन में बायोगैस प्राप्त करने के अलावा खेतों के लिये खाद भी प्राप्त होती है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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