ग्रीन हाउस प्रभाव किसे कहते हैं ? इसके कारण तथा दुष्परिणामों पर प्रकाश डालिए।

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विगत कुछ वर्षों से पृथ्वी के तापक्रम में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। पृथ्वी के तापक्रम की वृद्धि का प्रमुख कारण हरित पौधघर प्रभाव देखा गया है।

• हरितगृह (Greenhouse) का प्रयोग उन देशों में किया जाता है जहाँ पर शरदकाल में ताप के अभाव में फलों एवं सब्जियों के पौधों की उपयुक्त वृद्धि एवं बीजों का अंकुरण नहीं होता। हरितगृह में प्रयोग होने वाले काँच का यह गुण होता है कि उससे होकर सौर्थिक दृश्य प्रकाश (solar visible light) तो अन्दर प्रवेश कर जाता है परन्तु हरितगृह के शीशे की दीवार से, उसके अन्दर से बाहर की ओर विकसित होने वाली दीर्घ तरंग अवरक्त किरणें (Long wave infra red rays) बाहर नहीं निकल पातीं परिणामस्वरूप हरितगृह में ऊष्मा का संचयन होने लगता है और तापमान में वृद्धि होती है जिससे बीजों को अंकुरण एवं पौधों की वृद्धि के लिए अनुकूल तापमान मिल जाता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रम को हरितगृह प्रभाव (तापमान में वृद्धि) कहते हैं।

इसी प्रकार के समान प्रभाव का अध्ययन पृथ्वी के सन्दर्भ में भी किया जाता है। वायुमण्डल की कुछ गैसें हरितगृह के शीशे की दीवार जैसा व्यवहार करती है, क्योंकि ये सौर्थिक विकिरण को धरातल तक तो आने देती हैं परन्तु धरातल की बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण को अवशोषित कर लेती हैं और उन्हें पुनः धरातल की ओर प्रत्यावर्तित करती है जिससे भूतल निरन्तर गर्म होता रहता है। इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हरितगृह प्रभाव की परिभाषा निम्नलिखित प्रकार से दी जा सकती है परिभाषा – “वायुमण्डल में मानवजनित कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य गैसों के आवरण प्रभाव (Blanketting effect) के कारण भूतल के तापमान में निरन्तर वृद्धि को हरितगृह प्रभाव (Greenhouse effect) कहते हैं।”

हरितगृह गैसों के स्रोत (Sources of Greenhouse Gases)

हरितगृह गैसों के स्रोतों का वर्णन निम्नलिखित प्रकार है-

(1) मिलों, कारखानों एवं अन्यअनेक प्रतिष्ठानों में ऊर्जा एवं शक्ति प्राप्त हेतु जीवाश्म ईंधनों (कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस) को जलाने से उनकी चिमनियों से अपार CO2 गैस निकलती रहती है जो वायुमण्डल में पहुँचकर एकत्रित होती रहती है।

(2) जीवाश्म ईंधनों से चलने वाले उपकरण, परिवहन के साधन एवं कृषि यन्त्र से भारी मात्रा में CO2 निकालकर वायुमण्डल में पहुँचती रहती है।

(3) ताप विद्युतगृहों में विद्युत उत्पादन के लिए कोयला एवं खनिज तेल जलाने से अपार CO2 का उत्पादन होता है।

(4) ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में भोजन बनाने के लिए लकड़ी, कोयला एवं खनिज तेलों का प्रयोग करने से काफी मात्रा में CO, निष्कासित होती है।

हरित पौधगृह प्रभाव एवं ग्लोबल वार्मिंग (Greenhou Effect and Global Warming)

जैसा पहले बताया जा चुका है कि हरितगृह गैसें प्रवेशी लघु तरंग सौर्थिक विकिरण के लिए तो प्रायः पारदर्शी होती हैं परन्तु भूतल द्वारा विकीर्णित अधिकांश बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण को बाहर जाने से रोक लेती हैं। यही कारण है कि भूतल और उसके सम्पर्क का वायुमण्डल निरन्तर गर्म होता रहता है। इस प्रकार वायुमण्डल की अनेक गैसें धरातल की बहिर्गामी दीर्घ तरंग विकिरण की ऊष्मा को उसी प्रकार रोक लेती हैं जैसे हरितगृह काँच का बना होता है जो सूर्य की किरणों को प्रवेश तो करने देता है परन्तु धरातल से परावर्तित ऊष्मा कांच की दीवार एवं छत द्वारा अवरोधित कर दिया जाता है। जिससे हरितगृह के अन्दर तापमान बढ़ जाता है।

हरितगृह गैसों द्वारा पार्थिव विकिरण के निरन्तर अवशोषण से निचला वायुमण्डल अधिक गर्म होने लगता है और वहां से ऊष्मा का धरातल की ओर प्रतिलोम विकिरण (Counter radiation)

प्रारम्भ होता है परिणामस्वरूप धरातल एवं निचले वायुमण्डल के तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि होने • लगती है और स्थानीय, प्रादेशिक तथा विश्वस्तरीय जलवायु में परिवर्तन होने लगता है।

एक अनुमान के अनुसार विगत सौ वर्षों में हमारी पृथ्वी के तापमान में 0.5 से 0.7°C की वृद्धि हुई है और 1880 से 1940 के बाद उत्तरी गोलार्द्ध में जीवाश्म ईंधनों के जलाने से उत्पन्न हरितगृह गैसों के कारण 0.4°C की वृद्धि हुई है। परन्तु 1940 के पश्चात् औद्योगीकरण के कारण CO, के सान्द्रण में वृद्धि होते हुए भी तापमान कम हुआ है। दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तरी गोलार्द्ध से विपरीत परिणाम प्राप्त हुए हैं जहाँ 1940 से 1960 ई. तक तापमान में 0.6°C की निरन्तर वृद्धि हुई है।

उपरोक्त सन्दर्भ में एस. एच. स्नाइडर (S. H. Schneider, 1975) का मत है कि वायुमण्डलीय CO, सान्द्रण में दुगुने की वृद्धि हो जाने पर (300ppm से 600ppm) तापमान में 1.5°C से 3.0°C की वृद्धि हो जायेगी परिणामस्वरूप तापमान बढ़ने से वाष्पन एवं वाष्पोत्सर्जन बढ़ेगा, बादल अधिक बनेंगे जिससे प्रवेशी सौर्थिक विकिरण का परावर्तन हो जायेगा और भूतल पर सूर्य ताप कम प्राप्त होगा। इन सबका परिणाम यह होगा कि पृथ्वी का तापमान कम हो जायेगा।

ग्लोबल वार्मिंग से बचाव के उपाय (Preventing Measures)

हरितगृह प्रभाव में वृद्धि एवं उसके कारण होने वाले तापमान में वृद्धि से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय करने आवश्यक हैं

(1) तीव्र औद्योगिक विकास के लिए जीवाश्म ईंधनों (कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस) के उपभोग में अत्यधिक कमी करना आवश्यक है।

(2) जीवाश्म ईंधनों के स्थान पर अन्य ऊर्जा तथा शक्ति के वैकल्पिक स्रोत के रूप में मिथेनॉल (Methanol) का प्रयोग करना आवश्यक है।

(3) स्वचालित वाहनों में आधुनिकतम तकनीक वाले इंजनों का उपयोग करना चाहिए जिसमें न्यूनतम पेट्रोल से अधिकतम ऊर्जा प्राप्त हो सके और हरितगृह प्रभाव वाली गैसों का उत्सर्जन कम किया जा सके।

(4) ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक स्रोतों में सौर्थिक ऊर्जा, बायो गैस का उपयोग करना चाहिए जिससे जीवाश्म ईंधनों को जलाने की कम आवश्यकता पड़े।

(5) चूँकि वनस्पतियाँ CO2 की सर्वाधिक उपभोक्ता हैं अतः विस्तृत स्तर पर वनारोपण एवं वृक्षारोपण करना चाहिए।

(6) कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम करने के लिए वन विनाश को रोकना चाहिए और वनों को दावाग्नि से बचाना चाहिए।

ग्रीनहाउस प्रभाव’ के दुष्परिणाम (Hl Effects of Green House Effects) (1) ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण अब तक वायुमण्डल में लगभग 36 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि हो चुकी है एवं वायुमण्डल से 24 लाख टन ऑक्सीजन समाप्त हो चुकी है। वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा में वृद्धि के कारण विगत पचास वर्षों में पृथ्वी के औसत तापक्रम में 1°C की वृद्धि हो चुकी है। अनुमान है कि ग्रीनहाउस प्रभाव की यही स्थिति रही तो सन् 2050 ई. तक पृथ्वी के तापमान में लगभग 4°C तक वृद्धि हो जायेगी। ध्रुवीय क्षेत्रों में यह वृद्धि तक की वृद्धि हो जायेगी जिसका परिणाम यह होगा कि प्रायः सभी समुद्रतटीय नगर समुद्र में डूब जायेंगे। इस स्थिति में मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम, कोचीन एवं त्रिवेन्द्रम आदि भारत के नगर भी समुद्र में डूब जायेंगे। बांग्लादेश के भी बहुत से समुद्र तटवर्ती भाग जलमग्न हो जायेंगे। न्यूयार्क, लॉस एंजिल्स, पेरिस एवं लन्दन आदि बड़े नगर भी जलमग्न हो जायेंगे।

(2) ग्रीनहाउस प्रभाव में पृथ्वी के तापमान में अत्यधिक वृद्धि से मौसम में भयंकर बदलाव आयेगा। सूर्य की किरणें कैंसर जैसे रोग को जन्म देती है। कहीं सूखा पड़ेगा, कहीं गरम हवायें चलेगी, कहीं तूफान एवं कहीं बाद आयेगी।

(3) ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण पर्णहरिम नष्ट हो जायेगा, जिससे पौधों एवं फसलों की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ेगा।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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