परती या बंजर भूमि किसे कहते हैं ? परती भूमि विकास की विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।

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वर्तमान समय में इसकी उत्पादकता बनाये रखना चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 50% भाग या अधिक मात्रा में अधोगति को प्राप्त हो चुका है तथा वहाँ की भूमि बंजर एवं अनुपयोगी होती जा रही है। बढ़ती हुई आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भूमि सम्पदा का अत्यधिक दोहन ही इस अधोगति का प्रमुख कारण है। योजना आयोग तथा राष्ट्रीय परती भूमि विकास मण्डल द्वारा गठित, तकनीकी कार्य समिति ने परती भूमि की परिभाषा इस प्रकार की है, “ऐसी भूमि जो अनेक कारणों से अधोगति को प्राप्त हो चुकी है और वर्तमान में उसका उचित उपयोग नहीं हो पा रहा है (वर्तमान परती को छोड़कर), परती भूमि (Waste Land) कहलाती है।”

भूमि विकास समिति, 1984 (Society of Promotion of Wasteland Development SPWD) के अनुसार, “ऐसी भूमि जो अपनी भूमि तथा जल की स्थिति के अनुरूप जैवभार (Biomass) उत्पन्न नहीं करती है, पड़ती भूमि कहलाती है।”

परती भूमि के प्रकार (Types astelands)

परती भूमि को कई प्रकार से वर्गीकृत किया गया है

(1) उपयोगिता के आधार पर भारतीय कृषि संक्षेप में (1985) के अनुसार, परती भूमियों को निम्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है

श्रेणी (अ) कृषि अयोग्य परती भूमि (Unculturable Waste Land),

श्रेणी (ब) –क्षरित क्षेत्र– वायु क्षरित जल क्षरित, समुद्रतटीय भूमि । श्रेणी (स) निकृष्टीकरणकृत भूमि-चरागाह, पशुओं द्वारा चराई, स्थानान्तरकारी कृषि, सड़क के किनारे, रेल मार्ग के किनारे, तालाब के किनारे, मेड़ों की भूमि

श्रेणी (द)–समस्याग्रस्त भूमि-ऊसर और क्षारीय भूमि, जलाक्रांत भूमि, कंकड़ीली या पथरीली भूमि

श्रेणी (इ)–सीमान्त और अर्द्ध-सीमान्त भूमि (2) पड़ती भूमि विकास समिति (भूमला एवं खरे, 1984), स्वामित्व के आधार पर

(i) वन भूमि-अधोगति प्राप्त वन तथा वन भूमि, (ii) प्रक्षेत्र भूमि-प्रक्षेत्रों के अन्दर तथा बाहर की अधोगति प्राप्त भूमि, मॅड़ आदि ।

(iii) सामुदायिक भूमि (a) शासकीय स्वामित्व में रेलवे, सड़क और नहर के किनारे की भूमि, सामान्यजन भूमि, संस्थाओं की भूमि । कार्यों की

(b) ग्राम सामुदायिक भूमि — गाँव की सामलात भूमि, ग्रामसभा की भूमि, चरागाह गोचर, तालाबों के पास की भूमि

(c) संक्षारित क्षेत्र-संक्षारण के कारण किसी भी प्रकार से उपयोग न की जा सकने वाली

भूमि–जल संक्षारित, वायु संक्षारित, बीहड़ नदी के किनारे, स्थानान्तरित रेत के टीले, पर्त संक्षारण, गली संक्षारण तथा समुद्रतटीय रेतीली भूमि।

(d) खाली या रिक्त भूमि-ऐसी भूमि जो किसी कारण से कोई भी उपयोग में नहीं लाई जा रही है। (e) निकृष्टीकरणकृत भूमि अत्यधिक चराई तथा अव्यवस्थित चराई, हरियाली को कम करने के कारण अधोगति प्राप्त भूमि, जैसे-शहर, कस्बा और गाँव की सामूहिक या सामलाती भूमि, नहर के किनारे, सड़क के किनारे, तालाब की मेड़ों की भूमि तथा स्थानान्तरित कृषि भूमि । (1) समस्याग्रस्त क्षारीय भूमि, जलाक्रांत भूमि, कंकड़ीली-पथरीली लैटेराइट भूमि, आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी भूमि-सीमान्त भूमि तथा उपसीमान्त भूमि।”

परती भूमि बनने के कारण (Causes of Wasteland Formation)

परती भूमि बनने के कारणों का संक्षिप्त में विवरण निम्न प्रकार है भूमि,

(1) भूमि क्षरण (Soil erosion)-परती भूमि बनने का प्रमुख कारण भूमि क्षरण है, जो कि जल तथा वायु द्वारा होता है। भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत का बह जाना या अलग हो जाना भूमि क्षरण कहलाता है।

जल द्वारा भूमिक्षरण वर्षा के तेज बहाव के कारण होता है, जिसमें भूमि की ऊपरी पर्त बह जाती है। यदि भूमि में वनस्पति न हुई और वह ढलाव वाली है, तो इस क्रिया में वृद्धि हो जाती है। नदियों तथा नालों के किनारों की भूमि अधिक कटती है। वायु द्वारा भूमि क्षरण, वायु के तेज गति होने के कारण होता है, जिससे भूमि की ऊपरी पर्त उड़ जाती है। शुष्क क्षेत्रों में यह क्रिया अधिक तेजी से होती है। रेगिस्तानी क्षेत्रों में वायुक्षरण एक गम्भीर समस्या है। वृक्षों के न होने से यह क्रिया तेजी से होती है।।

(2) वृक्षों तथा अन्य वनस्पतियों का अभाव-भूमि में वृक्ष तथा झाड़ियों आदि रहने से वर्षा ऋतु में जल के बहाव की तीव्र भूमि कम हो जाती है, जिससे मिट्टी कम बहती है। वृक्ष अपनी विस्तृत जड़ों द्वारा भूमि के कणों को स्थिर रखते हैं। वन सम्पदाओं के अधिक दोहन परिणामस्वरूप वृक्षों की संख्या कम हो जाती है, जिससे भूमि क्षरण को बढ़ावा मिलता है और क्रमिक रूप से पड़ती भूमियों का निर्माण होता जाता है।

((3) अत्यधिक तथा अव्यवस्थित पशुओं की चराई चरागाह और गोचर भूमि जो पड़ती बन जाती है, उसका मुख्य कारण अव्यवस्थित चराई है। बढ़ती हुई पशु संख्या ने इस समस्या को जन्म दिया है। इसके साथ चरागाहों का उचित रूप में प्रबन्ध न किये जाने के कारण भी पड़ती भूमि का निर्माण होता है।

(4) खनन कार्य-भूमिगत खनिजों का दोहन करने तथा उसके अवशेषों को भूमि की ऊपरी पर्त पर फैला दिये जाने से भूमि पड़ती हो जाती है। ऐसी भूमियों में उत्पादन कार्य कठिन होता है। (5) स्थानान्तरकारी कृषि—इस प्रकार की कृषि के अन्तर्गत जंगलों की भूमि में लगे हुए वृक्षों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है और इस प्रकार से प्राप्त भूमि पर खेती की जाती है। तीन या चार वर्षों में जब इस भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है, तो इसे उसी रूप में छोड़ दिया जाता है।

(6) नहरों द्वारा सिंचाई नहरों द्वारा सिंचाई करने तथा नहरों में निरन्तर पानी भरा रहने से उसके आसपास की भूमि का जल स्तर ऊँचा हो जाता है। जो लवण भूमि की निचली सतह पर चला जाना चाहिए या न जाकर ऊपरी सतह पर जमा होते जाते हैं। भूमि की ऊपरी सतह पर लवणों के जमा होने से भूमि क्षारीय और ऊसर बन जाती है। ऐसी भूमियों को मनुष्य द्वारा निर्मित पड़ती भूमि कहा जाता है।

(7) जल-निकास का अभाव- ऐसी भूमि में जहाँ जल निरन्तर भरा रहता है, दलदली तथा जलाक्रान्त बन जाती है। इन भूमियों की उर्वरा शक्ति भी कम हो जाती है। इनका उचित रूप से उपयोग न कर सकने के कारण इन्हें पड़ती भूमि कहा जाता है।

(8) अवांछित खरपतवारों का जमाव-भूमि का उचित रूप में उपयोग न किये जाने पर उसमें अनेक प्रकार के खरपतवार उग आते हैं, जैसे-लैन्टाना, गाजर घास आदि। सड़कों, रेलमार्गों तथा नहरों के किनारे खाली परती हुई भूमि में ऐसे खरपतवार तेजी से पनपते हैं। ऐसी भूमि का उचित रूप में उपयोग न हो सकने की स्थिति में ये परती बन जाती हैं।

परती भूमि सुधार या विकास के उपाय (Methods of Wasteland Development)

परती भूमि सुधार या विकास हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाये जाते हैं

(1) ढलावदार स्थानों में कृषि कार्य, जैसे-कन्टूर खेती, ढलाव के विपरीत जुताई की विभिन्न फसलें उगाना चाहिए। (2) नावदार स्थानों में मैढ़, सीढ़ियाँ जैसे अवरोधक बनाने चाहिए। इससे मृदा क्षरण की दर कम होती है।

(3) जल बहाव के रास्तों पर घास लगानी चाहिए।

(4) वायु द्वारा क्षरण रोकने के लिए पौधों की सुरक्षा पट्टियों तथा वायु अवरोधक लगाने चाहिए तथा सघन वृक्षारोपण करना चाहिए। (5) कृषि वानिकीय चरागाहों, कृषि उद्यानकीय चरागाही कृषि, वानिकी पद्धतियों का उपयोग करना चाहिए।

(6) जलाक्रान्त भूमि में जल निकास का प्रबन्ध करना चाहिए।

(7) लवणीय भूमि का भौतिक एवं रासायनिक विश्लेषण करने के पश्चात् उसे जिप्सम, पायराइट आदि से उपचारित करना चाहिए।

(8) जैव खादों, गोबर खाद, धान की भूसी आदि का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए इससे भूमि में जीवांश की वृद्धि होने के साथ-साथ उसकी उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाती है।

(9) वृक्षों की कटाई प्रतिबन्धित करना चाहिए।

(10) जंगली भूमि के पौधों की आग से सुरक्षा करनी चाहिए।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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