जैव भौगोलिकी क्या है ? भारतवर्ष को कितने जैव भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा गया है ? प्रत्येक का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

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सम्पूर्ण विश्व के सभी क्षेत्रों में उपस्थित जन्तुओं एवं पेड़-पौधों की उत्पत्ति, उनके वितरण, वातावरण के साथ अन्तर्सम्बन्धों आदि का अध्ययन ही जैव भौगोलिकी (Biogeography) कहलाता है। जैव भौगोलिकी की निम्नांकित दो शाखाएँ होती हैं

(1) पादप भौगोलिकी (Phytogeography)-इसके अन्तर्गत पौधों की उत्पत्ति, उनके वितरण तथा पर्यावरण के साथ उसके अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

(2) जन्तु भौगोलिकी (Zoogeography) इसके अन्तर्गत जब्तुओं की उत्पत्ति, उनके वितरण तथा पर्यावरण के साथ उसके अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

भारतवर्ष के अधिकांश प्रदेशों की पादप एवं जन्तु प्रजातियाँ लगभग एक समान होती हैं। भारतीय उपमहाद्वीपीय को पेलियोट्रॉपिकल किंग्डम के मलायन उप-किंग्डम (Malayan sub-kingdom) के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। अध्ययन की सुविधा के लिए विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से इसे कई प्रक्षेत्रों में बाँटा है।

अध्ययन की सुविधा के लिए सम्पूर्ण भारतवर्ष को कुल 7 जैव भौगोलिक प्रक्षेपों में बाँटा गया है (1) हिमालय के पर्वत क्षेत्र, (2) इण्डोगैंगटिक मैदान, (3) पूर्वी प्रक्षेप, (4) राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के क्षेत्र, (5) डेकन त्रिकोण, (6) दक्षिणी पेनिनसुलर, (7) अण्डमान एवं निकोबार। (1) हिमालय के पर्वत क्षेत्र (Great Mountain Zones of Himalaya)-इसके अन्तर्गत

आसाम के हिमालय क्षेत्र, नेपाल के हिमालय क्षेत्र, गढ़वाल या पश्चिमी हिमालय क्षेत्र तथा पंजाब, कश्मीर या उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र आते हैं।

इसे चार उप-क्षेत्रों में बाँटा गया है (i) पूर्वी या आसामी हिमालय क्षेत्र – यह क्षेत्र 438 वर्ग मील क्षेत्रफल वाला है। ब्रह्मपुत्र नदी के नामचा बरवा से दार्जिलिंग के नीचे उपस्थित तीस्ता नदी (Teesta river) तक फैला है। यहाँ पर वर्षा काफी अधिक होती है तथा इसके ऊँचाई वाले भागों में हिमपात होता है।

पाये जाने वाले जन्तु-लाल पाण्डा, बकरे, एण्टीलोप भैंसा, गैंडा एवं गंगा के घड़ियाल पाये जाने वाले पौधे-साल, सागौन, कोनीफर्स (पाइन), ऑक, बाँस आदि।

(ii) केन्द्रीय या नेपाली हिमालय क्षेत्र यह क्षेत्र तीस्ता नदी एवं काली नदी के मध्य 50 मील क्षेत्र में फैला है। एवरेस्ट एवं कंचनजंगा नदी इसी क्षेत्र में आते हैं। पाये जाने वाले जन्तु-मस्क किरण, स्लायबियर, हिमालयन पाल्म, सिवेट बिल्ली, हिमालयन बाइवेट पाये जाने वाले पौधे-कोनीफेरस एवं नीले पाइन, देवदार बाँस आदि।

(iii) पश्चिमी या कुमायूँ गढ़वालीय हिमालय क्षेत्र यह क्षेत्र काली नदी एवं सतलज नदी के मध्य 187 मील क्षेत्र में फैला हुआ है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, नन्दादेवी, त्रिशूल, गंगोत्री एवं बन्दरपूँछ आदि पर्वत इस क्षेत्र की प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएँ हैं। यहाँ पर वर्षा कम होती है, तेज हिमपात होता है।

पाये जाने वाले जन्तु-स्लाथभालू, पोकुपाइन, तेंदुआ, बन्दर पाये जाने वाले प्रमुख पौधे-बिर्च, सैलिक्स, सिल्वर बिर्च

(iv) उत्तर पूर्वी या पंजाब एवं कश्मीर का हिमालय क्षेत्र-यह क्षेत्र सतलज नदी के पश्चिमी भाग से नागा पर्वत के मध्य 375 मील के क्षेत्र में सिन्धु नदी तक फैला हुआ है। पाये जाने वाले जन्तु-सांभर, स्वैम्प हिरण, कस्तूरी हिरण, तेंदुआ, हायेना (लकड़बग्घा), जंगली भैंस, सुनहरे लंगूर, स्नोलेपर्ड, गोल्डन बाज पाये जाने वाले पौधे-बॉस मानसूनी हरे एवं अर्द्ध-हरे वन, साल, क्यूप्रेस आदि

(2) इण्डोगैंगटिक मैदान ( Indo-Gangatic Plain)–यह भारतवर्ष का सर्वाधिक वृहत् जैव भौगोलिक क्षेत्र है जो कि बहुत-सी नदियों जैसे उत्तर भारत में गंगा, यमुना, शारदा, घाघरा एवं दक्षिण भारत में कोसी नदी तथा गण्डक नदी के पठारीय भागों तक फैला हुआ है। पाये जाने वाले जन्तु काली बतख, चिंकारा, भौंकने वाला हिरण, स्वैम्प हिरण, बारहसिंघा, टाइगर, जंगली भैंसा, नीलगाय, गुलाबी हुड वाली बतखें, तोते आद

पाये जाने वाले पौधे यहाँ पर उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वनों के पौधे; जैसे-साल, सागौन,

सिमुल, कोरल वृक्ष, शीशम एवं बाँस अधिकता में पाये जाते हैं।

(3) पूर्वी क्षेत्र (The Eastern Region)-इसके अन्तर्गत पश्चिमी बंगाल, आसाम, नागालैण्ड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा एवं उड़ीसा को सम्मिलित किया गया है। यह क्षेत्र पौधों एवं जन्तुओं से परिपूर्ण है। यहाँ पर पक्षियों की लगभग 500 प्रजातियाँ, ऑर्किड्स की 150 प्रजातियाँ एवं बाँसों की बहुत सी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। काजीरंगा, जलदायारा, मनास घाटी आदि राष्ट्रीय पार्क एवं अभयारण्य इसी क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं।

पाये जाने वाले जन्तु-बाघ, हाथी, एक सींग वाले गैंडे, घड़ियाल, भौंकने वाले हिरण, बारहसिंघा, चौसिंघा, सुनहरे लंगूर, रीसस बन्दर, चकत्ते वाले बिल्ड पेलिकन आदि।

(4) राजस्थान, गुजरात एवं मध्य प्रदेश के क्षेत्र (Rajasthan, Gujarat and Madhya Pradesh Region)—यह उत्तरी भारत के गर्म एवं अर्द्ध-आर्द्र क्षेत्र हैं जोकि पंजाब, हरियाणा, गुजरात से होते हुए राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग तक फैला हुआ है। अरावली पर्वत श्रृंखला इस क्षेत्र का मुख्य पहाड़ी क्षेत्र है।

पाये जाने वाले जन्तु बिल में रहने वाले जन्तु, कृन्तक जैसे-खरगोश, सिंह, नीलगाय, जंगली गधा, जंगली भालू, काला बक, सांभर, बारहसिंघा, एण्टीलोप, बाघ, बन्दर, धारी वाले लकड़बग्घे, सियार, सॉप, मोर, स्लेटी हेरोन, ग्रेट-इण्डियन बस्टर्ड, फ्लेमिंगो आदि। पाये जाने वाले पौधे-काँटे वाले पौधे, जैसे-कैक्टस, बहुवर्षीय घार्से, मौसल पौधे, साल, सागौन, सैमल आदि।

(5) डेकन त्रिकोण (The Deccan Triangle) इसके अन्तर्गत पश्चिमी घाट व पेनिनसुलर भारत आता है। यह क्षेत्र महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश एवं उत्तरी कर्नाटक तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में भारतवर्ष की कई बड़ी नदियाँ आती है तथा यहाँ पर दक्षिण-पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी मानसून सक्रिय होता है।

पाये जाने वाले जन्तु-बाघ, भैसा, सांभर, चीतल, भीलगाय, विभिन्न प्रकार के पक्षी मोर, स्ट्रोक, पेनिकल, किंगफिशर आदि। पाये जाने वाले पौधे-अर्द्ध सदाबहार एवं एरिड क्षेत्र में पाये जाने वाले पौधे; जैसे-सदासुगाहन,

बबूल, इमली, यूफोरबिया, सागौन, कदम्ब, हल्दू, अंजन, जामुन, नील, बरगद आदि । (6) दक्षिणी पेनिनसुलर (The Southern Peninsular)- यह क्षेत्र दक्षिणी भारत में कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल तक फैला हुआ है। यह भारतवर्ष में सर्वाधिक जैव-विविधता वाला क्षेत्र है जहाँ पर

हजारों प्रकार के जन्तु एवं पेड़-पौधे पाये जाते हैं। पाये जाने वाले जन्तु-हाथी, गौर, चार प्रकार के बन्दर, जैसे-बोनेट, बन्दर, लंगूर, सिंह पूँछी

बन्दर, नीलगिरी लंगूर, लोटिस, चीतल, पैगुइन, बिल्लियों की प्रजातियाँ आदि । पाये जाने वाले पौधे-यहाँ पर उष्ण कटिबन्धीय मानसूनी पौधे पाये जाते हैं। उदाहरण- सागौन, एबोनी, रोजवुड, चन्दन, सफेद कदार, बाँस आदि ।

(7) अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह (Andman and Nicobar Island) यह भारतवर्ष के दक्षिणी भाग में उपस्थित समुद्री द्वीप समूह है। यह भी वनस्पतियों एवं जन्तुओं से भरपूर है। पाये जाने वाले जन्तु यहाँ स्तनियों की 35 प्रजातियाँ सरीसृपों एवं समुद्री जन्तुओं की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण-अण्डमानी सुअर, मैकेक, चकत्तीदार हिरण, भौंकने वाले हिरण, हॉग

हिरण, सांभर, डुगांग, फाल्स फिलर, व्हेल, डॉल्फिन, पक्षियों की 250 प्रजातियाँ, नाडुम हार्नबिल, निलवारी कबूतर, समुद्री चीते आदि पाये जाते हैं।

पाये जाने वाले जन्तु यहाँ स्तनियों की 35 प्रजातियाँ सरीसृपों एवं समुद्री जन्तुओं की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण-अण्डमानी सुअर, मैकेक, चकत्तीदार हिरण, भौंकने वाले हिरण, हॉग,हिरण, सांभर, डुगांग, फाल्स फिलर, व्हेल, डॉल्फिन, पक्षियों की 250 प्रजातियाँ, नाडुम हार्नबिल, निलवारी कबूतर, समुद्री चीते आदि पाये जाते हैं। पाये जाने वाले पौधे यहाँ की जलवायु उष्ण कटिबन्धीय वर्षा वाली होती है, अतः यहाँ पर डिप्टेरोकार्पस, टर्मिनेलिया की विभिन्न प्रजातियाँ लैजरस्ट्रोमिया आदि की अधिकता होती है। यहाँ के समुद्री किनारों पर मैसूव वनस्पतियाँ भी पाई जाती हैं।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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