भूकम्प क्या है ? भूकम्प के कारणों तथा प्रभावों का वर्णन कीजिए।

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भूकम्प का सामान्य अर्थ ‘पृथ्वी का कम्पन’ है। जिस प्रकार किसी तालाब के शान्त जल में पत्थर का टुकड़ा फेंकने से गोलाकार लहरें केन्द्र से चारों तरफ बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार जब कहीं भूकम्प उत्पन्न होता है, तो उत्पत्ति केन्द्र से भूकम्पीय लहरें चारों ओर प्रवाहित होती है। सेलिसबरी ने भूकम्प को इस प्रकार परिभाषित किया है

“भूकम्प वे धरातलीय कम्पन है, जो व्यक्ति से असम्बन्धित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते है।” ऑर्लर होम्स के मतानुसार, “भूगर्मिक शैलों के विक्षोभ के स्रोत से उत्पन्न होने वाली लहरदार कम्पन ही भूकम्प है।” “भूकम्पल के प्रकम्प अथवा कम्प है, जो मानव से असम्बन्धित क्रियाओं के फलस्वरूप होते हैं।

जे. सी. मेसलवेन के अनुसार, “भूकम्प भू-पटल का कम्पन या लहर है, जो धरातल के नीचे अथवा ऊपर चट्टानों के लचीलेपन या गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में क्षणिक अव्यवस्था होने पर उत्पन्न होती है।”

जिस स्थान पर सर्वप्रथम भूकम्प की उत्पत्ति होती है, उसे भूकम्प मूल (Focus) कहते हैं। इस भूकम्प मूल के ठीक ऊपर पर भूकम्पीय लहरों का सर्वप्रथम अनुभव किया जाता है, उसे भूकम्प अधिकेन्द्र (Epicentre) कहते हैं।

भूकम्पीय लहरें (Waves of Earthquakes) – भूकम्पीय लहरें अपने उद्गम के चारों ओर समान गति तथा शक्ति से प्रसारित नहीं हो पाती हैं, क्योंकि धरातलीय रचना भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है। अतः इन लहरों की गति तथा शक्ति इस पर निर्भर करती है कि वे किस प्रकार के भू-भाग से होकर गुजरती हैं। भूकम्पीय लहरें सर्वप्रथम भूकम्प मूल से अधिकेन्द्र पर पहुँचती हैं, फिर वहाँ से चारों ओर इनका प्रसार मार्ग अण्डाकार होता है।

भूकम्पीय लहरों के प्रकार-भूकम्पीय लहरें मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है (1) प्रधान या प्राथमिक लहरें (Primary waves)-इन भूकम्पीय तरंगों को अनुदैर्ध्य तरंगे या पी. वेप्स (P. Waves) भी कहते हैं। ये लहरें अन्य सभी लहरों की अपेक्षा अधिक तीव्रगामी होती हैं। इनकी गति 8 से 14 किमी प्रति सेकण्ड होती है। ये लहरें ठोस तथा तरल पदार्थों में समान गति से गतिमान होती हैं और धरातल पर सबसे पहले पहुँचती हैं।

(2) आड़ी या गौण लहरें (Secondary Waves)-इन तरंगों को एस. वेब्स (S. Waves) या अनुप्रस्थ लहरें (Transverse Waves) भी कहते हैं। ये लहरें प्राथमिक लहरों के बाद अनुभव की जाती हैं। आड़ी या गौण लहरें प्राथमिक लहरों के समकोण पर चलती हैं और प्रधान लहरों की अपेक्षा अधिक गहराई तक जाती हैं, किन्तु ये लहरें तरल पदार्थों से होकर गुजरती हैं। इनकी गति 4 से 6 किमी प्रति सेकण्ड होती हैं।

(3) घरातलीय लहरें (Surface Waves or Long Waves)- ये 3 से 5 किमी प्रति सेकण्ड की गति से चलती हैं। ये लहरें पृथ्वी का चक्कर लगाकर पुनः अधिकेन्द्र पर पहुँचकर समाप्त हो जाती हैं। ये लहरें धरातल पर जल की लहरों की भाँति भ्रमण करती हैं। इन लहरों से ही धरातल पर सबसे अधिक विनाश होता है। इन लहरों को अधिकेन्द्र तक पहुँचने में अधिक समय लगता है। इसीलिए इनको लम्बी अवधि वाली लहरें (Long Waves or L. Waves) कहा जाता है।

इन भूकम्पीय लहरों की गति, दिशा, वेग तथा उद्गम स्थल का ज्ञान भूकम्प मापक यन्त्र (Seismograph) द्वारा किया जाता है। इस यन्त्र द्वारा कागज पर लहरें रेखाओं के रूप में अंकित हो

जाती हैं, इन्हीं रेखाओं का अध्ययन कर भूकम्प सम्बन्धी जानकारी प्राप्त की जाती हैं।

भूकम्प की उत्पत्ति के कारण (Causes of Origin the Earthquakes)

भूगर्भशास्त्रियों ने विभिन्न भूकम्प क्षेत्रों के पर्यवेक्षण तथा अध्ययन के आधार पर भूकम्प के निम्नलिखित कारण बताये हैं

(1) ज्वालामुखी क्रिया (Volcanic Eruption)-भूकम्प क्षेत्रों का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि भूकम्प प्रायः भूपटल के उस निर्बल भाग में आया करते हैं, जहाँ ज्वालामुखियों का उद्गार होता रहता है। अनेक भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि ज्वालामुखी और भूकम्प दोनों क्रियाओं के एक से ही कारण, तथ्य तथा परिस्थितियाँ हैं।

ज्वालामुखी उद्गार भूगर्भीय, अति शक्तिशाली एवं तीव्र गैस एवं जलवाष्प के कमजोर भूपटल को तोड़कर ऊपर निकलने से होता है। इसके लिए ये गैसें तथा जलवाष्प भूपटल के नीचे अपनी भरपूर शक्ति से भयंकर धक्के मारती हैं, जिससे भूकम्प उत्पन्न हो जाते हैं।

(2) भूपटल अंश (Faulting)-भूगर्भिक बलों के कारण उत्पन्न तनाव तथा दबाव से धरातलीय चट्टानों में दरारें पड़ जाती है। इससे अंश-घाटी तथा अवरोधी पर्वतों आदि की रचना होती है। इस रचना काल में चट्टानें ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर खिसकती हैं। इनके अचानक खिसकने से भूकम्प उत्पन्न हो जाते हैं।

(3) भू-सन्तुलन में अव्यवस्था (Isostatic Disturbance)-भूपटल के विभिन्न भाग प्रायः सन्तुलन की अवस्था में रहते हैं, किन्तु जब भू-गतियों एवं अन्य कारणों से इस सन्तुलन में क्षणिक या दीर्घकालिक अव्यवस्था हो जाती है, तब सन्तुलित स्थापित करने के लिए धरातलीय चट्टानों में हलचल होती है, तो उससे भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

(4) भूपटल में सिकुड़न-भूगर्भशास्त्री डाना तथा इली डी. ब्यूमाउण्ट के अनुसार, “पृथ्वी से ऊष्मा के विकिरण द्वारा पृथ्वी का ह्रास होता है। फलतः पृथ्वी की ऊपरी परत शीतल होकर सिकुड़ती है। अब यह सिकुड़न तीव्र गति से होती है, तो भूकम्प उत्पन्न हो जाते हैं।”

(5) जलीय भार-मानव निर्मित विशाल बाँधों से अत्यन्त विस्तृत एवं विशाल जलाशयों का निर्माण होता है। इनमें जलीय भार के कारण उनकी तली की चट्टानों में भू-सन्तुलन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है और चट्टानें इधर-उधर होने लगती हैं। इस परिवर्तन के फलस्वरूप भूकम्प उत्पन्न होते हैं।

(6) गैसों का फैलाव-जब किसी प्रकार से जल भूगर्भ में पहुँच जाता है, तो वही जल अत्यधिक तापमान के कारण जलवाष्प में बदल जाता है। जब इस गैस की मात्रा पर्याप्त बढ़ जाती है, तो वह दबावयुक्त होने के लिए भूगर्भ से बाहर आने हेतु भूपटल की निचली चट्टानों पर धक्के मारती है। इससे भूपटल पर कम्पन उत्पन्न हो जाता है।

(7) प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics)- इस सिद्धान्त के अनुसार, भू-प्लेटें धीमी गति से खिसकती रहती हैं। जब कभी इनके खिसकने में रुकावट पड़ती है, तो चट्टानों पर दबाव एवं तनाव बढ़ जाता है। जब चट्टानें इस दबाव तथा तनाव को सह नहीं पाती हैं, तो वे किसी दरार के साथ टूट जाती हैं जिससे भूकम्प उत्पन्न उत्पन्न हो जाता है। भीषणतम भूकम्प इसी प्रकार के होते हैं।

भूकम्प का प्रभाव (Effects of Earthquakes)

हानिकारक प्रभाव- भूकम्प अत्यधिक विनाशकारी होते हैं। इनके विनाशकारी प्रभाव निम्नलिखित

(1) मनुष्य निर्मित रचनात्मक वस्तुओं की क्षति-भूकम्पों के झटकों तथा धक्कों से सड़कें, रेलमार्ग तथा भवन क्षण भर में ध्वस्त हो जाते हैं, जैसे-सन् 1923 में जापान की सगामी खाड़ी में आये भूकम्प से 5,00,000 घर ध्वस्त हो गये थे।

(2) नगरों का कष्ट होना-भूकम्पों से कभी-कभी तो सम्पूर्ण नगर नष्ट हो जाते हैं, जैसे-11 अक्टूबर, सन् 1737 को कोलकाता में आये भूकम्प से 3,00,000 लोग मारे गये तथा अधिकांश नगर ध्वस्त हो गये।

(3) बाढ़ का प्रकोप- भूकम्पों के कारण नदियों के मार्ग अवरुद्ध हो जाने से भयंकर बाढ़ आ जाती है, जैसे-सन् 1950 में असम (भारत) में आये भूकम्प में ब्रह्मपुत्र नदी के अवरुद्ध हो जाने से भयंकर बाढ़ आ गई, जिससे अपार जन-धन की हानि हुई।

(4) भूस्खलन-भूकम्पों से विशाल शिलाखण्ड फिसलकर घाटियों में गिरते हैं, जिनसे धन व जन की क्षति होती है।

(5) भूखण्डों में दरारों का पड़ना-भूकम्पों से धरातलीय चट्टानों में अनेक दरारें पड़ जाती हैं, जिनसे उपजाऊ भूमि विलीन हो जाती है और झील या दलदली भूमि प्रकट हो जाती है, जैसे सन् 1887 में असम (भारत) में आये भूकम्प से 11-6 मीटर चौड़ी तथा 193 किमी लम्बी दरार का निर्माण हो गया।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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