जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं ? उसके प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।

0
99

जल जीवधारियों के लिए प्रकृति में उपलब्ध सर्वाधिक महत्वपूर्ण यौगिक होता है, क्योंकि जल शरीर के निर्माण में भाग लेने के साथ-साथ विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक होता है। हमारे शरीर का लगभग 60 से 80 प्रतिशत भाग जल का बना होता है। हम इस जल को प्रकृति से शुद्ध जल के रूप में प्राप्त करते हैं। आज विश्व की जनसंख्या में लगातार वृद्धि, औद्योगीकरण, शहरीकरण आदि

के कारण शहरों एवं औद्योगिक इकाइयों के द्वारा अनेक प्रकार के हानिकारक पदार्थ, जल के साथ बड़ा दिये जाते हैं जिसके कारण जल अनुपयोगी हो जाता है। यह जल नदी, तालाबों, झीलों एवं अन्त में समुद्र में पहुँचकर वहाँ पर उपस्थित जल को प्रदूषित कर देता है। इस प्रकार के भौतिक एवं रासायनिक संगठन में परिवर्तन हो जाता है और यह जीवधारियों के लिए अनुपयोगी हो जाता है। इसे ही जल प्रदूषण कहते हैं।

जल प्रदूषण के मुख्य स्रोत, कारण एवं प्रभाव (Main Sources, Causes and Effects of Water Pollution)

जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित होते हैं-

(1) वाहित मल (Domestic Wastes and Sewage)-हमारे घरों में बहुत से अपशिष्ट एवं अनुपयोगी पदार्थ होते हैं जो जल में छोड़ दिये जाते हैं। उदाहरण-मानव मल, कागज, डिटर्जेण्ट्स, साबुन, बरतन एवं कपड़ा धोया हुआ पानी आदि ।

नगरों में मकानों से निकला मल-मूत्र व कूड़ा-करकट भूमिगत नालियों द्वारा नदियों व झीलों आदि में गिराया जाता है। इस प्रकार नदियों का जल दूषित हो जाता है। इस जल को पीने या उसमें नहाने-धोने से अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं। पानी में वाहित मल की अत्यधिक मात्रा का उसमें रहने वाले जीवों पर भी प्रभाव पड़ता है। वाहित मल व कार्बनिक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिए जल में घुली ऑक्सीजन काम आती है जिससे जल में इसका अभाव हो जाता है और जलीय जीव मर जाते हैं।

(2) औद्योगिक बहिस्रावी पदार्थ (Industrial Effluents)- औद्योगिक इकाइयों के द्वारा भी विभिन्न प्रकार के कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थ, वार्निश, तेल, ग्रीस, अम्ल आदि पदार्थ पानी के साथ बहा दिये जाते हैं। ये पदार्थ बहते हुए नदियों, तालाबों तक पहुँच जाते हैं और वहाँ उपस्थित जल को प्रदूषित कर देते हैं। नशीले पेय पदार्थ, टेनरीज, कपड़ा रंगाई, कागज तथा पल्प वाली मिलों (mills) तथा स्टील उद्योग बहिस्रावी पदार्थों में कार्बनिक तथा अकार्बनिक दोनों प्रकार के प्रदूषक (pollutants) उपस्थित होते हैं। इनमें मुख्य प्रदूषक तेल, ग्रीस, प्लास्टिक, प्लास्टीसाइजर्स, धात्विक अपशिष्ट तथा निलम्बित ठोस, फीनोल्स, टोक्सिन्स, अम्ल, लवण, रंग, सायनाइड तथा DDT आदि होते हैं। इनमें से कुछ प्रदूषक अपघटित नहीं होते हैं जिससे प्रदूषण की समस्या आ जाती है। कोयले की खानों (coal mines) से निकला H2SO4 भयंकर प्रदूषक होता है तथा जल की कठोरता (Hardness) को बढ़ाता है तथा जीवों पर हानिकारक प्रभाव डालता है। उद्योगों से भारी धातुओं जैसे-Cu, Cr, Ch, Hg, Pb व Na आदि के बहिस्स्रावी पदार्थ पानी में छोड़ दिये जाते हैं।

(3) कृषि विसर्जित पदार्थ (Agricultural Discharge) यह प्रमुख रासायनिक पदार्थ होते हैं जिन्हें उर्वरक या कीटनाशी आदि के निर्माण के लिए प्रयोग में लाया जाता है। भारत में इस प्रकार का विसर्जन (discharge) विश्व की अपेक्षा में कम है, किन्तु इनमें वृद्धि होने से प्रदूषण की सम्भावना बनी रहती है।

(4) कार्बनिक पदार्थ एवं कीटनाशी (Organic Matter and Pesticides)- इसके अन्तर्गत कीटनाशी (pesticides), अनेक औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ, तेल अथवा अन्य कार्बनिक अपघटित पदार्थ आते हैं। कारखानों से निकाले गये अपशिष्ट पदार्थों के साथ तेल (oil) समुद्री मछलियों के शरीर से मनुष्य के शरीर में पहुँचता है जिसका प्रभाव विषैला होता है। फसलों को कीटों एवं कवकों से सुरक्षित रखने के लिए कीटनाशी (pesticides) कार्बनिक

यौगिकों का प्रयोग किया जाता है; जैसे-D.D.T., डीलड्रिन (Dieldrin), BHC, PCBS तथा बेन्जीन यौगिक इनके अत्यधिक प्रयोग करने से अनेक लाभदायक जीवधारी भी नष्ट होने लगते हैं और पारिस्थितिक तन्त्र असन्तुलित होने लगता है। मिट्टी में मिलकर ये कीटनाशी लाभदायक जीवाणुओं (useful bacteria) को नष्ट कर देते हैं जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। कीटनाशी पदार्थ पौधों के अंगों; जैसे-पत्तियों, तनों तथा फलों द्वारा मनुष्यों तथा जानवरों के शरीर में भोजन द्वारा पहुँच जाते हैं जो अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं।

(5) घरेलू अपमार्जक (Detergents) घरों की सफाई, रसोई के बर्तन साफ करने तथा नहाने-धोने में अपमार्जकों (Detergents) का उपयोग तेजी से हो रहा है। ये पदार्थ जल के साथ नालियों के माध्यम से नदियों, तालाबों एवं झीलों इत्यादि में पहुँचकर उसके पानी को प्रदूषित कर देते हैं।

(6) रासायनिक उद्योगों, ताप विद्युतगृहों एवं नाभिकीय ऊर्जा केन्द्रों के अपशिष्ट पदार्थ (Wastages)- औद्योगिक तथा अनेक शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट पदार्थों के माध्यम से अनेक प्रकार के अकार्बनिक रासायनिक पदार्थ पानी में घुलकर नदियों के जल में मिल जाते हैं। ये रासायनिक पदार्थ होते हैं जो मछलियों तथा जलीय जीवों को हानि पहुँचाते हैं और कभी-कभी मछलियाँ इनके प्रभाव से मर जाती है। अतः जल प्रदूषित हो जाता है जिससे इसे पीने के लिए अथवा औद्योगिक कार्य के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त ताप (heat) तथा रेडियोएक्टिव पदार्थ (radioactive substances) भी मुख्य प्रदूषक होते हैं। थर्मल तथा न्यूक्लियर पॉवर स्टेशन्स में पानी का प्रयोग बहुत अधिक मात्रा में होता है। प्रयोग होने के पश्चात् बहुत अधिक तापमान का जल पुनः नदियों या झीलों में डाला जाता है जिससे जलीय जीवों का जीवन प्रभावित हो जाता है। अतः इसे तापीय प्रदूषण (Thermal pollution) कहते हैं।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here