मृदा अपरदन से आप क्या समझते हैं? इसके कारण एवं प्रबन्धन की विधियों को विस्तार से समझाइये।

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पृथ्वी के धरातल के ऊपरी परत जिस पर पेड़-पौधे उगते हैं उसे मृदा (Soil) कहते हैं। मृदा मानव का मूलभूत संसाधन है, क्योंकि पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला समस्त जीवन मृदा पर ही निर्भर होता है। मानव की सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति मृदा से ही होती है। हंटिंग्टन एवं अन्य विद्वानों ने मृदा को प्राकृतिक वातावरण का प्रधान तत्व माना है। विलकॉक्स (Wilcox) ने यहाँ तक कहा है कि मानव सभ्यता का इतिहास मृदा का इतिहास है और व्यक्ति को शिक्षा मिट्टी से ही प्राप्त होती है। इस प्रकार मृदा वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन है जिससे हमारे दैनिक जीवन की सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर होती है। मृदा की अवनति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

मृदा की अवनति के प्रमुख कारण (1) वाहित मल-जल (2) भारी धातुओं का जमाव, (3) मृदा में विषैले पदार्थों का जमाव, (4) काँच एवं पॉलीयीन, (5) जल प्रदूषण, (6) अम्ल वर्षा, (7) मृदा अपरदन, (8) कृषि जन्य कचरा, (9) कीटनाशी एवं खरपतवारनाशियों का अधिकाधिक उपयोग, (10) घरेलू कचरे का जमाव आदि।

भूमि या मृदा अपरदन (Soild Erosion )

मृदा पृथ्वी की ऊपरी एक परत के रूप में है जो साधारणतः 3.50 फीट से 4.50 फीट तक मोटी होती है। पौधों को जमने, पोषित करने, वृद्धि करने आदि के लिए आवश्यक पदार्थ मृदा से ही प्राप्त होते हैं। मृदा की विभिन्न गहराइयों की बनावट भिन्न-भिन्न होती है जिसमें मृदा का ऊपरी भाग जिसे शीर्ष मृदा (top soil) कहते हैं, अत्यन्त आवश्यक होता है। इसी में खनिज लवण, ह्यूमस (humus ) तथा विभिन्न सूक्ष्म जीव (micro-organisms) होते हैं जो इसकी उपजाऊ शक्ति को बनाते या बढ़ाते हैं। तेज वायु, आँधी, वर्षा, बहता जल इत्यादि अनेक कारणों से शीघ्र मृदा का ऊपरी भाग या तो

अपने स्थान से हटकर दूर चला जाता है या किन्हीं कारणों से उपजाऊ शक्ति देता है। इस प्रकार मृदा की हानि को भूमि अपरदन (soil erosion) कहते हैं।

(1) वाहित मल-जल (2) भारी धातुओं का जमाव, (3) मृदा में विषैले पदार्थों का जमाव, (4) काँच एवं पॉलीथीन, (5) जल प्रदूषण, (6) अम्ल वर्षा, (7) मृदा अपरदन, (8) कृषि जन्य कचरा, (9) कीटनाशी एवं खरपतवारनाशियों का अधिकाधिक उपयोग, (10) घरेलू कचरे का जमाव आदि।

मृदा या भूमि अपरदन के कारण एवं प्रभाव (Causes and Effects of Soil Erosion) प्रकृति में निम्नलिखित कारणों से मृदा की इस उपजाऊ परत से यह शक्ति कम हो सकती है-(1) खनिज लवणों की समाप्ति (depletion of minerals), (2) निक्षालन (leaching), (3) अपरदन (erosion) |

(1) खनिज लवणों की समाप्ति (Depletion of minerals) मृदा पर उगने वाले पौधे मृदा से आवश्यक खनिज पदार्थ प्राप्त करते हैं। इस प्रकार फसल काटने के बाद मृदा में बहुत से लवर्णो जैसे-पोटैशियम, अमोनियम इत्यादि से नाइट्रेट्स, फॉस्फेट्स, सल्फेट्स आदि की कमी हो जाती है। अतः मृदा की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। सूक्ष्म जीव (micro-organism) भी मृत कार्बनिक पदार्थ और कुछ आवश्यक अकार्बनिक पदार्थों को अपघटित (decompose) करते रहते हैं। इस प्रकार ह्यूमस तथा प्राप्य लवण (available salts) की कमी उर्वरा शक्ति (fertility) को कम करने में सहायक होती है।

(2) निक्षालन (Leaching)-मृदा से लवणों की मात्रा जल के कारण भी कम हो सकती है। जल इन लवणों को घोलकर मृदा की निचली परतों में ले जाता है और शीर्ष मृदा (top soil) की. उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। इसी शीर्ष मृदा में तो अधिकतर पौधों की जड़ें रहती हैं। इस क्रिया को निक्षालन (leaching) कहा जाता है।

(3) अपरदन (Erosion)-भारी वर्षा तथा तेज वायु के कारण शीर्ष मृदा कटकर या उड़कर अपने स्थान से दूर चली जाती है। इस प्रक्रिया को भूमि अपरदन (soil erosion) कहते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों, जहाँ जल का बहाव तथा वायु का बहाव दोनों ही तेज होते हैं, अपरदन अत्यधिक होता है। जल द्वारा अपरदन की क्रिया कई प्रकार से हो सकती है; जैसे

(क) जब भूमि का अपरदन एक समान तथा धीरे-धीरे होता है, परत अपरदन (sheet. erosion) कहलाता है।

(ख) अधिक वर्षा में जब छोटी-छोटी जालियाँ बन जाती हैं और मृदा वह जाती है, क्षुद्र-सरिता अपरदन (rill erosion) कहलाता है।

(ग) नालिका अपरदन (gully erosion) जबकि नालियाँ गहरी हो जाती हैं, विशेषकर जल के तेज बहाव के कारण शीर्ष मृदा के अलावा अध-मृदा (sub-soil) भी वह जाती है।

मृदा संरक्षण या मृदा अपरदन रोकने के उपाय (Measures of Soil Erosion or Soil Prevention)

(1) भूमि में ह्यूमस की वृद्धि करना (Increase of humus) भूमि की उर्वरता को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रकार की खाद मिलाकर प्राप्त किया जा सकता है। इसी से पौधे अधिक उत्पन्न होंगे और मृदा में ह्यूमस (humus) की मात्रा बढ़ेगी। ह्यूमस में जल रोकने की क्षमता होती है। इस प्रकार ह्यूमस की अधिकता में अपरदन रोका जा सकता है। इस कार्य के लिए कम्पोस्ट खाद (compost manure) तथा कभी-कभी हरी खाद (green manure) का उपयोग अच्छा रहता है।

(2) वनारोपण (Reforestation)—जिन स्थानों से वनों को साफ कर दिया जाता है वहाँ भूमि अपरदन बढ़ जाता है। अतः ऐसे स्थानों में, ढलानों पर, नालियों के आस-पास वनस्पति विकसित करना अति आवश्यक है। वृक्षारोपण होने से जड़ें भूमि को बाँधने में सहायक होती हैं। वर्गों के होने पर वायु में नमी की मात्रा बढ़ जाती है।

(3) वेदिका निर्माण (Terracing)– पर्वतीय भागों में पूरे ढलान को छोटे-छोटे समतल खेतों में डाँट दिया जाता है और इनको सीढ़ियों की तरह काट लिया जाता है। इस प्रकार बनाई गई वेदिकाओं या सीढ़ियों (terraces) के आधार पर नालियाँ होती हैं ताकि अतिरिक्त जल को आगे ले जाया जा सके। वेदिकाएँ जल को अधिक मात्रा में नीचे जाने से रोकती हैं और भूमि अपरदन नहीं होने पाता।

(4) पट्टीदार कृषि (Strip cropping) –कम ढालू पहाड़ी क्षेत्रों में इस विधि का प्रयोग किया जाता है। यहाँ भूमि को बहुत सी पट्टियों में विभाजित कर लेते हैं। इन पट्टियों में दो प्रकार की फसलें लगायी जाती हैं-पंक्ति फसल (row crop) तथा ढकने वाली फसल (cover crop) (मक्का, कपास, आलू आदि की फसलें जो भूमि को काफी हद तक ढक लेती हैं तथा जल के बहाव को रोकती हैं। इन पौधों की जड़ें मिट्टी को बन्धित कर लेती हैं, अतः उनका अपरदन नहीं हो पाता।

(5) कण्टूर कृषि (Contour farming)-पहाड़ी भागों में ढाल के कारण मिट्टी पानी के बहाव के साथ बहकर निचले स्थानों में एकत्रित हो जाती है। मिट्टी के इस प्रकार अपरदन को रोकने के लिए ऐसे स्थानों में शिखर से नीचे की ओर समकोण बनाते हुए गोलाई में जुताई-गुड़ाई की जाती है। इस प्रकार नालियों में पानी एकत्रित रहता है जिसे भूमि अवशोषित कर लेती है तथा नालियों के किनारे की मिट्टी बन्ध का कार्य करती है। इस प्रकार की कृषि को कण्ट्र्री कृषि (contour farming) कहते हैं।

(6) बाँध निर्माण (Dam building) तेज बहाव वाले अधिक जल को रोकने और उसे आवश्यकतानुसार काम में लाने के लिए बाँध (dams) निर्मित किये जाते हैं। इस जल को बालों, नहरों आदि के द्वारा गन्तव्य स्थान तक ले जाया जाता है।

(7) जानवरों के चरने पर नियन्त्रण (Control on grazing)–नियन्त्रित चरागाहों में पशुओं को चराने की व्यवस्था की जाने से अनियमित चरने की हानियों से बचा जा सकता है। भारी जानवरों के पैरों से पौधे कुचल जाते हैं, साथ ही मिट्टी या तो दबकर ठोस हो जाती है या खुदकर अपनी उपजाऊ शक्ति कम कर देती है। भूमि पर वनस्पति न रहने से भूमि अपरदन में सहायता मिलती है।

(8) खेतों को परती छोड़ना (Fallowing of fields)–जब लगातार भूमि पर खेती की जाती है. तो उसकी उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। इस प्रकार की भूमि पर हल चलाकर परती छोड़ देने से दोहरा लाभ होता है। एक तो भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने वाले तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है, दूसरी ओर बहुत सी बीमारियों को नष्ट करने में सहायता मिलती है।

(9) ऐसी फसलों की खेती की जा सकती है जिनकी जड़ें अपने आस-पास की मिट्टी को जकड़ लेती हैं और इस प्रकार अपरदन को रोकती है। ऐसी फसलों में ज्वार, बाजरा, जौ आदि है। बारी-बारी से बोते हैं। इस प्रकार से एक फसल के बाद दूसरी फसल को एकान्तरित कराने की क्रिया

(10) शस्यावर्तन (Crop-ratation)- दूसरी फसलों को मटर कुल की फसलों के साथ को ही शस्यावर्तन (crop rotation) कहा जाता है। एक विशेष प्रकार के पौधे विशेष प्रकार के खनिजों का अवशोषण करते हैं। अतः लगातार एक ही फसल को उगाते रहने से भूमि में विशेष तत्वों की कमी हो जाती है। अतः फसलों को प्रति वर्ष बदलकर बोना चाहिए।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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