मानवाधिकार से आप क्या समझते हैं ? प्रमुख मानवाधिकारों का वर्णन कीजिए।

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संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में 10 दिसम्बर 1948 को पेरिस में संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा द्वारा मानव अधिकारों की घोषणा तथा मानव अधिकारों के सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र (चार्टर) 1948 को लागू होने के फलस्वरूप यह बात देखने में आई कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् स्वाधीन हुए भारत जैसे लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों ने अपने-अपने संविधानों में मानव अधिकारों से सम्बन्धित उन समस्त प्रावधानों को मान्यता दी, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने चार्टर में स्वीकार किया था तथा जिन पर विश्वभर के जनप्रतिनिधियों ने अपनी स्वीकृति की मोहर लगाई थी। यदि इनमें कोई परिवर्तन हुआ भी तो मात्र इतना कि विभिन्न देशों ने अपने विशेष सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश के अनुसार इनमें कुछ संशोधन अथवा परिवर्तन कर लिये जो स्वाभाविक थे।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत मानव अधिकार (Human Rights under the Indian Constitution)

भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश के संविधान में मानवाधिकारों के संरक्षण को लेकर लगभग उन सभी प्रावधानों को मान्यता दी है, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में अंकित है। साथ ही देश की कुछ विशेष सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार शताब्दियों से शोषित पीड़ित दुर्बल जातियों के उत्थान तथा समान सामाजिक स्तर बनने तक उनके लिये विशेष सुविधाओं का भी प्रावधान किया गया है।

भारत के संविधान में मानव अधिकारों से सम्बन्धित प्रावधान निम्नानुसार है 1. संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि “हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिये और उसके समस्त नागरिकों को समस्त सामाजिक, नागरिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार, न्याय, विचारों की स्वतन्त्रता, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, आस्था, धर्म तथा उपासना आदि की स्वतन्त्रता,

प्रतिष्ठा तथा अवसरों की समानता प्राप्त कराने के लिये और इसके साथ ही व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर इस संविधान को अंगीकृत एवं आत्मार्पित करते हैं।” इस प्रकार भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही नागरिकों के मूल अधिकार जो मूल रूप से मानव अधिकार ही है, की घोषणा की गई है। 2. संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि भारत में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति न्याय की दृष्टि से समान होगा। भारत राष्ट्र की सीमाओं के अन्दर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कानून की दृष्टि से बराबर का स्थान एवं समान कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।

3. संविधान के अनुच्छेद 15 में बताया गया है कि धर्म, समूह, वंश-जाति, लिंग तथा जन्मस्थान आदि के आधार पर किये जाने वाले भेदभाव को पूर्णतया समाप्त कर दिया गयाहै। इसका आशय यह है कि प्रत्येक धर्म, विश्वास, जाति, वंश तथा स्थान के लोग समान दर्जा प्राप्त है तथा उन्हें समान अधिकार प्राप्त हैं। किसी के साथ किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति सार्वजनिक भोजनालयों, दुकानों, प्रतिष्ठानों, होटल एवं सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों पर स्वतन्त्रतापूर्वक जाने का अधिकारी होगा। वह सार्वजनिक कुओं, तालाबों, स्नानगृहों, सड़कों, रास्तों आदि का प्रयोग करने के लिये भी स्वतन्त्र होगा उस पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया जायेगा।

4. संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार लोक राज्य सेवा का लाभ उठाने का सभी को समान अवसर दिये जाने की गारंटी दी गई है। इस अनुच्छेद में बताया गया है कि राज्य के अधीन रिक्त किसी भी पद स्थान पर भर्ती के संबंध में धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, निवास आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन इस अनुच्छेद के साथ ऐसे शोषित पीड़ित वर्गों को, जो सूचीबद्ध किये गये हैं, आरक्षण की सुविधा दिये जाने का भी प्रावधान है। इस अनुच्छेद में इस पर विशेष बल दिया गया है कि धर्म, वंश, जाति अथवा लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव या पक्षपात न होने पाए तथा सरकारी व गैर-सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिये वांछित योग्यता के अतिरिक्त और कोई शर्त मान्य न हो।

5. संविधान के अनुच्छेद 17 से अस्पृश्यता को पूर्ण प्रतिबंधित कर दिया गया है। कानून और संविधान की दृष्टि में इस कुप्रथा को दण्डनीय अपराध माना गया है। संविधान में यह प्रावधान भारत की विशेष सामाजिक परिस्थितियों को देखकर किया गया है।

6. संविधान के अनुच्छेद 18 में ब्रिटिश शासन के समय की खान बहादुर रायसाहब और सर आदि उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है। जनसेवा, शिक्षा, सेना आदि सेवाओं के लिए राष्ट्रीय सम्मान सीमित किए गए हैं। यह प्रावधान भी मानव समाज में समानता स्थापित करने के लिए ही है।

7. संविधान के अनुच्छेद 19 में भारत के सभी नागरिकों को बोलने, लिखने और अपना मत व्यक्त करने की स्वतन्त्रता दी गई है। उन्हें शांतिपूर्वक जनसभाएँ करने अथवा सम्मेलन आयोजित करने, अपना दल अथवा संगठन बनाने, देश के प्रत्येक भाग में आने-जाने और घूमने-फिरने, देश की सीमाओं के भीतर किसी भी स्थान पर रहने, बसने तथा कोई भी रोजगार अथवा व्यवस्था करने की आजादी दी गई है, लेकिन इस शर्त के साथ कि व्यक्तियों या जनसमूहों द्वारा बनाए गए संगठन उनके द्वारा बोले या लिखे गए वाक्य अथवा देश के किसी भाग में उनकी गतिविधियाँ समाज एवं राष्ट्र विरोधी न हों। वे समाज, राज्य या उसके किसी भाग को आहत न कर रह हों। संविधान में स्पष्ट किया गया है कि व्यक्तियों व संगठनों को यह स्वतन्त्रता देश के प्रभुत्व एवं अखण्डता के मूल्य पर नहीं होगी।

8. संविधान के अनुच्छेद 20 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को उस समय तक अपराधी नहीं समझा जाएगा, जब तक कि उसके द्वारा किया गया कोई कार्य कानूनी रूप से अपराध के दायरे में न आता हो अथवा ऐसा व्यक्ति, दोष सिद्ध न हो चुका हो। इस अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को एक अपराध के लिए एक से ज्यादा बार सजा नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद में माना गया है कि प्रत्येक व्यक्ति उस समय तक पूर्णतया स्वतन्त्र है, जब तक कि वह किसी अन्य की स्वतन्त्रता और उसके मूल अधिकारों के लिए बाधा नहीं बनता।

9. संविधान के अनुच्छेद 21 में व्यक्ति को जीवित रहने और उसकी दैहिक स्वतन्त्रता को सुरक्षित किया गया है। अनुच्छेद में कहा गया है कि कानून द्वारा निश्चित किये गये प्रावधानों को लागू किये बगैर किसी व्यक्ति के जीवन या उसकी दैहिक स्वतन्त्रता को वंचित नहीं किया जा सकता। तात्पर्य यह है कि इस अनुच्छेद के अन्तर्गत किसी व्यक्ति को न तो उस वक्त तक जेल के अन्दर बन्द किया जा सकता है और न उसे फाँसी पर लटकाया जा सकता है जब तक किसी मान्य विधि द्वारा शासन ने ऐसा अधिकार प्राप्त न कर लिया हो।

मानव की मर्यादा इसी स्वतन्त्रता के अन्तर्गत जो दण्ड प्रक्रिया संहिता तैयार की गई, उसमें किसी व्यक्ति को बन्दी बनाने, बन्दी को हथकड़ी पहनाने या अन्य यातनाएँ देने की शर्तें या सीमाएँ निर्धारित की गई है। यह भी निर्देशित किया गया है कि विचाराधीन मुकदमों का निपटारा कम-से-कम समय में हो, वादी को न्याय शीघ्र मिले तथा प्रत्येक व्यक्ति को कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार दिया जाए, चाहे वह किसी संगीन अपराध में ही संलग्न हो। इसी क्रम में जेल के अन्दर रखे गये कैदियों को सुविधाएँ देने तथा कानूनी दायरे में उनके मूल अधिकारों की सुरक्षा करने का प्रावधान भी दण्ड प्रक्रिया संहिता में किया गया है।

10. संविधान के अनुच्छेद 22 में किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी से पूर्व या बाद में शीघ्रातिशीघ्र अपनी गिरफ्तारी का कारण जानने का पूर्ण अधिकार दिया गया है। गिरफ्तार व्यक्ति को सूचित किए बिना अधिक समय तक निरुद्ध नहीं रखा जाएगा, क्योंकि इस प्रकार की नजरबंदी व्यक्ति के मूल अधिकारों के विपरीत है। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी के विरुद्ध किसी भी सक्षम न्यायालय में जाने और न्याय पाने का अधिकार दिया गया है।

11. संविधान के अनुच्छेद 23 में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों से जबर्दस्ती काम या श्रम करवाने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया है। संविधान में कहा गया है कि मानव के मानव प्रति के दुर्व्यवहार उससे बलात श्रम या बेगार लेने को कानूनन वर्जित कर दिया गया है और इस बात का उल्लंघन करना अपराध होगा।

12. संविधान के अनुच्छेद 24 में कारखानों, फैक्ट्रियों या दूसरे प्रतिष्ठानों में छोटे या नाबालिग बच्चों से काम करवाने पर पूर्ण रोक लगाई गई है। वैधानिक रूप से यह स्वीकार किया गया है कि प्रत्येक बालक को अपने मानसिक एवं शारीरिक विकास के लिए पूर्ण आजादी मिलनी चाहिए। छोटी उम्र में बच्चों को श्रम करने के लिए विवश करने को दण्डनीय अपराध माना गया है।

13. संविधान के अनुच्छेद 25 में सभी भारतीयों को अपने-अपने धर्म पर चलने और उसे मानने का अधिकार दिया गया है। लेकिन जहाँ तक राज्य का सवाल है उसका अपना कोई धर्म या धार्मिक झुकाव नहीं होगा। इस अनुच्छेद में व्यक्तियों को धार्मिक आचरण करने की ही नहीं, शांतिपूर्वक उसका प्रचार करने की स्वतन्त्रता भी दी गई है, लेकिन इस शर्त के साथ कि इससे दूसरे धार्मिक समुदायों की भावनाएँ आहत न हों।

14. संविधान के अनुच्छेद 26 में व्यक्तियों और समूहों को अपने धर्मों का शांतिपूर्वक प्रचार करने और धार्मिक संस्थाओं का प्रबंध करने की छूट दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 27 और 28 भी धार्मिक स्वतन्त्रता के संबंध में है। अनुच्छेद 28 में धार्मिक शिक्षा देने के लिए व्यक्तियों को शिक्षण संस्थाएँ स्थपित करने का अधिकार दिया गया है, लेकिन साथ ही यह शर्त भी लगाई है कि राज्य द्वारा संचालित किसी शिक्षण संस्था में किसी धर्म विशेष की शिक्षा नहीं दी जाएगी।

15. संविधान के अनुच्छेद 29 में देश में रहने वाले अल्पसंख्यकों के हितों को सुरक्षित करने का उल्लेख किया गया है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि देश के किसी भी भू-भाग में रहने वाले अल्पसंख्यक नागरिकों को अपनी संस्कृति, भाषा एवं लिपि आदि को बनाए रखने का पूर्ण अधिकार होगा। इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली जाएगी। अगले अनुच्छेद में अल्पसंख्यकों को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे अपनी भाषा और संस्कृति को विकसित करने के लिये अपने द्वारा संचालित संस्थाएँ स्थापित कर सकते हैं और उनका प्रबंध स्वयं कर सकते हैं।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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