लुप्तप्रायः या संकटग्रस्त प्रजातियाँ क्या है ? ये कितने प्रकार की होती हैं ? लुप्तप्रायः प्रजातियों के संरक्षण के प्रमुख उपायों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

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लगातार बढ़ती हुई मानव जनसंख्या, इसकी भोजन व अन्य पदार्थों की बढ़ती हुई माँग ने प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन किया है। शहरी क्षेत्रों की वृद्धि, भवनों एवं सड़कों का निर्माण, कृषि भूमि की बढ़ोत्तरी के लिए वनों की कटाई, बाँध निर्माण आदि के कारण प्राकृतिक संसाधनों की लगातार कमी होती जा रही है। नगरीकरण, औद्योगीकरण, उर्वरकों, रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण पर्यावरण प्रदूषित होने लगा है तथा मिट्टी, जल एवं वायु भी प्रदूषित हो गई है जिसके कारण वन्य जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इसके अतिरिक्त मनुष्य ने अपने लाभ एवं लालच तथा स्वार्थों की पूर्ति हेतु जानवरों का अनियिन्त्रत शिकार एवं उनकी तस्करी की है जिसके कारण जन्तुओं का जीवन भी खतरे में पड़ गया है।

भारत की संकटापन्न पादप जातियों की सूची बनाने का प्रथम संगठित प्रयास 1970 के लगभग बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (Botanical Survey of India, BSI) तथा वन अनुसन्धान संस्थान, देहरादून (Forest Research Institute, FRI Dehradun) द्वारा किया गया और इन्होंने लगभग 100 जातियों की सूची बनाई। अब यह सूची दिन-प्रतिदिन लम्बी होती जा रही है। बी. एस. आई (BSI) के रैड डाटा बुक (Red Data Book) के प्रथम भाग में 235 संकटापन्न भारतीय पादप जातियों की सूची है। भारत में 1992 तक कुल मिलाकर 450 विलुप्त प्रायः पादप जातियाँ पहचानी गई हैं। रेड डाटा बुक’ शब्द उन पुस्तकों के लिये उपयोग में लाया जाता है जिनमें किसी विशेष क्षेत्र की संकटापन्न पादप या प्राणी जातियों को रखा जाता है। इसके विपरीत एक ‘ग्रीन बुक’ (Green Book) भी है जिसमें असाधारण पौधों (Rare plants) को रखा जाता है। विशेष रूप से वे असाधारण पौधे जो सुरक्षित क्षेत्रों जैसे-वानस्पतिक उद्यानों (Botanical gardens) आदि में उगते हैं। भारत के लिए प्रतिलिपित (Mimeographed) एक ‘ग्रीन बुक’ में लगभग 100 असाधारण पौधों की सूची है जो वॅॉटेनिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के उद्यानों में उग रहे हैं।

सामान्यतः किसी भी जाति को संकटापन्न जाति तब माना जाता है जब इसका प्राकृतिक पुनर्जन्म (Natural regeneration), प्राकृतिक और अप्राकृतिक कारणों (Natural and Unnatural means) द्वारा उस जाति के उपयोग एवं विनाश (Exploitation and destruction) के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सक्षम न हो। किसी भी जाति का विलुप्तीकरण हालाँकि विकास का एक घटक (Component) है और कुछ जातियों का विलुप्तीकरण हो रहा है।

लुप्तप्राय या संकटग्रस्त जातियों के प्रकार (Types of Endangered Species)

डाटा बुक (Red Data Book) के अनुसार, लुप्तप्रायः या संकटग्रस्त प्रजातियों को निम्नलिखित 6 समूहों में वर्गीकृत किया गया है IUCN ने जैव-विविधता के संरक्षण के लिए जीवों को पाँच वर्गों में विभाजित किया है

(1) विलुप्त (Extinct) -जातियों की ऐसी श्रेणी जो कुछ स्थानों में विलुप्त हो चुकी हैं और तेजी से अन्य स्थानों से भी विलुप्त हो रही हैं। इन्हें विलुप्त (Extinct) जातियों की श्रेणी में रखा है।

(2) संकटापन्न (Endangered)- इस वर्ग में उन जातियों को रखा है जो किसी भी कारण से समाप्त हो रही हों, उनकी संख्या नहीं बढ़ रही है अर्थात् इनकी संख्या कम होती जा रही है।

(3) सुभेद्य असुरक्षित) (Vulerable)-ऐसी जातियाँ जो असुरक्षित हैं अर्थात् कभी भी नष्ट हो सकती हैं या उन्हें सहज नष्ट किया जा सकता है इन्हें सुभेद्य (Vulnerable) जातियों की श्रेणी में रखा गया है।

(4) दुर्लभ (Rare)- इस वर्ग में ऐसी जातियों को रखा गया है जो दुर्लभ है अर्थात् जिनकी संख्या कम है एवं उनका आवास स्थान किसी विशेष परिस्थिति में ही हो सकता है।

(5) अपर्याप्त ज्ञात जातियाँ (Insufficiently Known Species)-कुछ जातियाँ इस प्रकार की होती हैं जिनके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं होती। इन्हें अपर्याप्त ज्ञात जातियों के वर्ग में रखा गया है।

(6) भय से परे (Out of danger)-इसके अन्तर्गत उपरोक्त पाँच प्रकार के समूहों में से किसी एक प्रकार के समूह की भाँति पादप प्रजातियाँ होती हैं और इनका संरक्षण होने के फलस्वरूप अपने पूर्व वास स्थान (habitat) में स्थापित हो जाती है।

विलुप्तता के कारण (Causes of Extinction)

पादप एवं जन्तुओं की विलुप्तता के प्रमुख कारण

(1) प्राकृतिक कारण (Natural Causes)

(i) वायु एवं जल प्रदूषण

(ii) बाढ़, सूखा, भूकम्प, ज्वालामुखी आदि। (iii) विभिन्न प्रकार के रोग

(iv) क्रान्तिक रूप से कम आबादी (100 से कम)।

(v) परागण करने वालों की कमी। (vi) विदेशी प्रजातियों का प्रवेश

(2) मानव निर्मित कारण (Man-made Causes) –

(i) प्राकृतिक आवासों का रूपान्तरण एवं उनका नष्ट होना। (ii) वाणिज्यिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक एवं अनुसन्धान सम्बन्धी उद्देश्यों के लिए जैव-विविधता का अतिदोहन।

(iii) पालतू जानवरों द्वारा अतिचारण (Overgrazing by domesticated animals)। (iv) कुंज का पुनर्जनन (और चारण की कमी) (Regeneration of scrub and lack of grazing)। (v) कृषि में परिवर्तन (Change in farming)

(vi) प्राचीन घास स्थलों की जुताई (Ploughing of old grasslands ) (vii) रूढ़िवादी ग्रामीण कार्यक्रम (Traditional rural practices) |

(viii) पर्यटन एवं पर्यटक विकास (Tourism and tourist development)। (ix) खनन एवं आखनन (Mining and quarrying)

(x) पुनःस्थापित पौधों का दबाव (Pressure of introduced plants)।

लुप्तप्राय या संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण (Conservation of Endangered Species)

लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण हेतु निम्न कदम उठाने चाहिए-

(1) नियन्त्रित तथा सीमित उपयोग के द्वारा प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा (2) सुरक्षित क्षेत्रों; जैसे-राष्ट्रीय उद्यान, अभयास्य व बायोस्फीयर रिजर्व (National Parks, Sanctuaries and Biosphere Reserve) का निर्माण तथा उनमें पाये जाने वाली जीवनक्ष (Viable) जातियों की संख्या को बनाये रखना।

(3) पादप तथा जन्तु जातियों के लिए बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना । (4) कानून (Legislation) द्वारा सुरक्षा |

(5) बीज, परागकण, ऊतक (Seeds, Pollen grain, tissue) आदि के रूप में जर्मप्लाज्म (Germplasm) का एकत्रीकरण व परिरक्षण (Collection and preservation of germplasm)। (6) अत्यधिक उपयोग (Over-exploitation) के नियन्त्रण का एक तरीका यह है कि संकटापन्न जातियों के व्यापार पर नियन्त्रण किया जाये।

(7) समाज को शिक्षित किया जाये ताकि लोग वन्य जीवन के महत्वों को समझ सकें तथा लोगों में इसके प्रति सामाजिक जागरूकता की भावना उत्पन्न हो सके। गैर-सरकारी संगठन (Non-Government Organisation)

कुछ गैर-सरकारी (Non-Government) संस्थान निम्न हैं

(i) बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (Bombay Natural History Society) जो 1983 में स्थापित की गई। भारत, म्यांमार और सीलोन के फौना एवं फ्लोरा के बारे में सूचनाएँ तथा नमूनों (Specimen) को एकत्रित करने में जुटी है।

(ii) वाइल्ड लाइफ प्रिजर्वेशन सोसायटी ऑफ इण्डिया, देहरादून (Wildlife Preservation Society of India, Dehradun) की नींव 1958 में रखी गई। वन्य प्रबन्धन से सम्बन्धित इसके कई उद्देश्य हैं।

(iii) वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फण्ड, इण्डिया (The World Wildlife Fund, India)- ये मुख्यतः जन्तुओं के संरक्षण से सम्बन्धित है।

सरकारी संगठन (Government Organisations)

कई वन्य जीवन कानून समय-समय पर बनाये गये हैं, ये कानून स्टेट तथा यूनियन (State and Union) दोनों ही सरकारों द्वारा बनाये गये हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण हैं

(1) इण्डियन बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ (Indian Board for Wildlife, IBWL, 1952)

(2) भारत 1976 में CITES का एक वादी (Party) भी बन गया है।

(3) इण्डियन नेशनल मैन एण्ड बायोस्फीयर कमेटी, 1972 (Indian National Man and Biosphere Committee, 1972) इसका गठन बायोस्फीयर रिजर्व निर्माण के लिए किया गया है।

(4) नेशनल वाइल्ड लाइफ एक्शन प्लान, 1982 (National Wildlife Action Plan, 1982)- यह IBWL के द्वारा लागू किया गया।

(5) राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों एवं प्राणी उद्यानों की स्थापना।

(6) वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972)।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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