मानव अधिकारों का संरक्षण एवं सार्वभौमिक घोषणा 1948 की व्याख्या कीजिए।

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संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में मानव अधिकार सम्बन्धी व्याख्या-

1. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की प्रस्तावना- “मानव के मौलिक अधिकारों, मानव के व्यक्तित्व के गौरव तथा महत्व में तथा पुरुष और स्त्रियों के समान अधिकारों में आस्था प्रकट की जाती है।”

2. धारा 1–“संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य मानवाधिकारों के प्रति सम्मान को प्रोत्साहन देनातवा जाति, लिंग तथा धर्म के बिना किसी भेदभाव के मौलिक अधिकारों को बढ़ावा देना तथा प्रोत्साहित करना ”

3. धारा 13- “महासभा के द्वारा जाति, लिंग, या धर्म के भेदभाव के बिना सभी को मानवाधिकार तथा मूलभूत स्वतन्त्रताओं की प्राप्ति में सहायता दी जायेगी।” 4. धारा 55- “संयुक्त राष्ट्र सं जाति, लिंग, भाषा या धर्म के भेदभाव के बिना सभी के लिए

मानवाधिकार तथा मूलभूत स्वतन्त्रताओं को प्रोत्साहन देगा।” 5. धारा 56. “सभी सदस्य राष्ट्र मानवाधिकारों तथा मानवीय स्वतन्त्रताओं की प्राप्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को अपना सहयोग प्रदान करेंगे।” 6. धारा 62 – “आर्थिक तथा सामाजिक परिषद सभी के लिए मानवाधिकारों तथा मूलभूत स्वतन्त्रताओं के प्रति सम्मान की भावना बढ़ाने तथा उनके पालन के सम्बन्ध में सिफारिश करेगी।”

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights)

‘मानवाधिकार आयोग (Commission of Human Rights) द्वारा लगभग तीन वर्षों के अथक परिश्रम के उपरान्त मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा का प्रारूप बनकर तैयार हुआ 10 दिसम्बर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने कुछ संशोधनों के साथ इस प्रारूप को स्वीकार कर लिया। इसी दिन मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणा-पत्र जारी कर दिया गया। इस घोषणा पत्र में 30 धाराएँ हैं।

धारा 1– “सभी मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र हैं और अधिकार एवं प्रतिष्ठा में समान हैं। उनमें विवेक और बुद्धि है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को दूसरों के प्रति भ्रातृत्व का व्यवहार करना चाहिए।” धारा 2 – “प्रत्येक मनुष्य बिना जाति, वर्ग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक अथवा सामाजिक उद्गम, जन्म या किसी दूसरे भेदभाव के, इस घोषणा में व्यक्त किये हुए सभी अधिकारों और स्वतन्त्रताओं के उपयोग का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त किसी स्थान या देश के साथ, जिसका वह व्यक्ति नागरिक है, राजनीतिक स्तर के आधार पर भेद नहीं किया जायेगा, चाहे वह देश स्वतन्त्र हो, संरक्षित हो या शासनाधिकार से हीन हो अथवा किसी अन्य प्रकार से सीमित सम्प्रभु ।”

धारा 3 – “प्रत्येक मनुष्य को जीवन, स्वतन्त्रता और सुरक्षा का अधिकार है। ”

धारा 4– “कोई भी व्यक्ति दासता अथवा गुलामी में नहीं रखा जा सकेगा। दासता और दास व्यवस्था सभी क्षेत्रों में सर्वथा निषिद्ध होगी।”

धारा 5– “किसी भी व्यक्ति को अमानुषिक दण्ड नहीं दिया जायेगा और क्रूरतापूर्ण व अपमानजनक व्यवहार ही किया जायेगा।” न ही उसके प्रति

धारा 6– “प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार होगा कि वह प्रत्येक स्थान पर कानून के अधीन व्यक्ति माना जाए।”

धारा 7–”कानून के समक्ष सभी व्यक्ति समान होंगे और बिना किसी भेदभाव के कानून की सुरक्षा प्राप्ति के अधिकारी हैं।”

धारा 8 – “प्रत्येक व्यक्ति को संविधान या कानून द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को भंग करने वाले कार्यों के विरुद्ध राष्ट्रीय न्यायालयों से संरक्षण पाने का अधिकार होगा।”

धारा 9–”किसी व्यक्ति को अवैधानिक ढंग से न तो बन्दी बनाया जाएगा, न कैद किया जाएगा और न ही निष्कासित किया जाएगा।”

धारा 10-“प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायालय द्वारा अपने अधिकारों और कर्तव्यों तथा अपने विरुद्ध लगाए गए किसी अपराध के निर्णय के लिए उचित तथा खुले रूप में सुनवाई करवाने का समान रूप से अधिकार है।”

धारा 11 (i) –“प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दण्डनीय अपराध का आरोप है, उस समय तक कि उसे एक खुले मुकदमे की सुनवाई के पश्चात् अपराधी सिद्ध न कर दिया जाए, उसे अपनी निर्दोषता प्रमाणित करने का पूर्ण अवसर दिया जाएगा।”

(ii) — “जो अपराध, अपराध करने के समय किसी राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय कानून के

अन्तर्गत दण्डनीय नहीं था, उसके लिए अपराध के बाद बने हुए कानून द्वारा किसी व्यक्ति को दण्डित नहीं किया जा सकेगा। जो सजा, अपराध करने के समय कानून के अनुसार वैध थी, उससे अधिक सजा भी बाद के बने कानून द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकेगी।”

धारा 12–”किसी की भी पारिवारिक, गृहस्थी मूलक और पत्र-व्यवहार की गोपनीयता में मनमाना हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और न उसके सम्मान व प्रतिष्ठा को ही क्षति पहुँचाई जा सकेगी।”

धारा 13 (i)– “प्रत्येक व्यक्ति का अपने राज्य की सीमा के भीतर आवागमन और निवास की स्वतन्त्रता का अधिकार होगा।”

(ii) – “प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश को, जिसमें उसका अपना देश भी सम्मिलित है, छोड़ने का अधिकार है और पुनः अपने देश में लौटने का भी अधिकार है।

धारा 14 (i)– “प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यक कष्ट व अपमान से बचने के लिए भी देश में शरण लेने और सुखपूर्वक रहने का अधिकार है।”

(ii) – “गैर-राजनीतिक अपराध या संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों व उद्देश्यों के विरुद्ध होने वाले कार्यों के फलस्वरूप मुख्यतया दण्डित व्यक्ति उपर्युक्त अधिकार से वंचित रहेंगे।”

धारा 15 (i)”प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रीयता का अधिकार प्राप्त होगा।” (ii) – “किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से उसकी राष्ट्रीयता से वंचित नहीं किया जा सकेगा और न उसकी राष्ट्रीयता परिवर्तन के मान्य अधिकार से ही वंचित किया जाएगा।”

धारा 16 (i) – “वयस्क स्त्री और पुरुष को जाति, राष्ट्रीयता अथवा धर्म की सीमा के बगैर; विवाह करने तथा परिवार बसाने का अधिकार है। उन्हें विवाह करने का वैवाहिक जीवन में और

वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद के समान अधिकार प्राप्त है।”

(ii) – “विवाह के इच्छुक स्त्री-पुरुष की पूर्ण स्वतन्त्रता और स्वीकृत पर ही विवाह सम्पन्न होगा।”

(iii)–“परिवार समाज की प्राकृतिक एवं मौलिक सामूहिक इकाई है और उसे राज्य द्वारा संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है।”

धारा 17 (i)– “प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अथवा दूसरों के साथ सम्पत्ति रखने का अधिकार है।” (ii)–“कोई भी व्यक्ति अपनी सम्पत्ति से बलात् नियधिकृत नहीं किया जा सकता है।”

धारा 18 “प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अनुभूति तथा धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार प्राप्त है। ”

धारा 19–“प्रत्येक व्यक्ति को मत और विचार अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता है।”

धारा 20 (i) – “प्रत्येक व्यक्ति को शान्तिपूर्ण ढंग से सभी कार्य करने की स्वतन्त्रता है।” (ii) –”किसी भी व्यक्ति को बलात् किसी संस्था में सम्मिलित होने के लिए विवश नहीं किया जा सकता है।”

धारा 21(i)– “प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के प्रशासन में स्वतन्त्रतापूर्वक निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा भाग लेने का अधिकार है।”

(ii)–“प्रत्येक व्यक्ति अपने देश की सरकारी सेवाओं में योग्यता के बल पर स्थान प्राप्त करने का अधिकारी है।” (iii)– “जनमत ही प्रशासन शासनाधिकार का आधार होगा और जनमत का निर्णय मतदान द्वारा किया जाएगा।”

धारा 22–“प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार प्राप्त होगा।”

धारा 23(i)– “प्रत्येक व्यक्ति को काम करने, इच्छानुसार अपनी जीविका हेतु व्यवसाय सुनने, काम की उचित परिस्थितियाँ प्राप्त करने तथा बेकारी से बचने का अधिकार है।”

(ii)–“प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समाज कार्य के लिए समान वेतन पाने का अधिकार है।” (iii)– “प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्य के लिए समुचित पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकारी है।” (iv)–”प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों की सुरक्षा के लिए श्रम-संघ गठित करने अथवा उसमें सम्मिलित होने का अधिकारी है।”

धारा 24-“प्रत्येक व्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है।”

धारा 25 (i)– “प्रत्येक व्यक्ति को अपना समुचित जीवन स्तर बनाए रखने का अधिकार है।” (ii)–“प्रत्येक माता को शिशु के मातृत्व और शिशु को विशेष देखभाल तथा मातृत्व सहायता प्राप्त करने का अधिकार है।”

धारा 26 “प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा पाने का अधिकार है। शिक्षा का लक्ष्य मानव व्यक्ति का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों एवं मौलिक स्वतंत्रताओं की प्रतिष्ठा को बढ़ाना होगा।”

धारा 27 – “प्रत्येक व्यक्ति को सांस्कृतिक अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक व्यक्ति सांस्कृतिक क्रिया-कलापों में बिना किसी भेदभाव के भाग ले सकता है और अपनी प्रतिभा से लाभान्वित हो सकता है।”

धारा 28–“प्रत्येक व्यक्ति ऐसी सामाजिक तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का अधिकारी है जिससे इस घोषणा में उल्लेखित अधिकारों और स्वतन्त्रताओं की पूर्ण प्राप्ति हो सके।”

धारा 29 (i)– “समाज के प्रति व्यक्ति के कुछ ऐसे कर्तव्य हैं जिनके पालन से ही उसके व्यक्ति का स्वतंत्र एवं पूर्ण विकास सम्भव है।” (ii)”प्रत्येक व्यक्ति को अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपभोग करने में उन सीमाओं के अन्दर रहना होगा जो कानून द्वारा निर्धारित की गई हैं।” (iii) “संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों और सिद्धान्तों के विरुद्ध किन्ही अधिकारों व स्वतन्त्रताओं का उपयोग अमान्य है।”

धारा 30– “इस घोषणा पत्र में उल्लिखित किसी भी आदेश के ऐसे अर्थ न लगाए जाएँ जिनसे किन्हीं राज्यों के समूह या व्यक्ति को किसी भी ऐसे कार्य में लगाने या करने का अधिकार मिले जिसका इस घोषणा पत्र में वर्णित अधिकारों और स्वतन्त्रताओं में से किसी एक को नष्ट करने का लक्ष्य हो ।” घोषणा का स्वागत

श्रीमती रूजवेल्ट ने मानवाधिकार की सार्वभौम घोषणा को सम्पूर्ण मानव समाज के मैग्नाकार्य’ की संज्ञा दी। कुछ विद्वानों ने इसे ‘मानवतावाद का दमकल’ कहकर पुकारा। चार्ल्स मलिक ने लिखा है, “यह घोषणा पत्र केवल प्रस्ताव मात्र न होकर संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का ही एक अंग है।” परन्तु पाल्मर व परकिन्स ने इस सम्बन्ध में कहा है कि “घोषणा केवल आदर्शों का प्रतिपालन है, कानूनी रूप से बाध्य करने वाला कोई समझौता नहीं है, परन्तु यह एक महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय मसविदा निश्चय ही है।”

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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