विश्व की खाद्य समस्या या संकट को समझाइए

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खाद्य संसाधन (Food Resources)

खाद्य संसाधन से आशय-मानव द्वारा प्रयुक्त समस्त संसाधनों में खाद्य संसाधन सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन हैं, क्योंकि यह संसाधन समस्त मानवीय समुदाय को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सतत रूप से आधार प्रदान करते हैं। खाद्य संसाधनों के अभाव में मानव जीवन का अस्तित्व असम्भव है। वर्तमान में उपलब्ध खाद्य संसाधनों के दो वर्ग हैं

1. शाकाहारी संसाधन-इनमें कृषि उत्पाद महत्वपूर्ण हैं। विश्व की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या अपने भरण-पोषण के लिये कृषि से प्राप्त खाद्यान्न, तिलहन तथा फलों पर निर्भर है। यह जनसंख्या प्रमुख रूप से अपने भोजन में खाद्यान्न के रूप में चावल तथा गेहूँ का उपयोग करती है। इसके अलावा पशुओं से प्राप्त दूध का उपयोग भी शाकाहारी भोजन के रूप में किया जाता है।

2. माँसाहारी संसाधन-इनमें वे खाद्य संसाधन प्रयोग में लाये जाते हैं, जो वनस्पति से प्राप्त न कर जीव-जन्तुओं के शिकार से प्राप्त किये जाते हैं। इन संसाधनों को प्राप्त करने के लिए मानव द्वारा विश्व के विभिन्न भागों में मत्स्यपालन, मुर्गीपालन तथा पशुपालन कार्य किया जा रहा है। पश्चिमी विकसित राष्ट्रों की जनसंख्या का एक बड़ा भाग आज अपने भोजन में मछलियों, मुर्गियों तथा पशुओं के मांस का प्रयोग करता है।

खाद्य संसाधन से सम्बन्धित समस्याएँ (Problems Related to food Processing)

1. विश्व की खाद्य समस्या (World Food Problems)

प्रत्येक मनुष्य की पहली आवश्यकता है-भोजन भोजन से ऊर्जा मिलती है और इसी ऊर्जा से हम दैनिक कार्य-कलाप करते हुए अपना जीवन संचालित करते हैं। विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में हमारे खाद्य उत्पादन का अनुपात कम होता जा रहा है। जनसंख्या के आँकड़े एक ओर देखें तो, मानव की उत्पत्ति से लेकर 10 लाख वर्षों की वृहत अवधि में जनसंख्या केवल 55 करोड़ हो सकी लेकिन पिछली तीन शताब्दियों में ही यह संख्या बढ़कर 337 करोड़ पहुँच गई और 21वीं सदी आते-आते यह 600 करोड़ पार कर गई, गणना यह बतलाती है कि हर चालीस वर्षों में यह दुगुनी हो जायेगी। दूसरी ओर खाद्यान्न का उत्पादन देखें तो यह इस तेज गति से नहीं बढ़ रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि विश्व आज गम्भीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा है।

जनसंख्या के अलावा अन्य भी कारण है जिससे हमारे सामने खाद्यान्न समस्या उत्पन्न हुई है; जैसे-कृषि भूमि की कमी होना, भूमि प्रदूषण बढ़ना, सिंचाई साधनों का विकसित न होना इत्यादि। इन सभी कारणों से भी खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हुआ है और खाद्यान्न समस्या उत्पन्न हुई।

2. आधुनिक कृषि का अभाव (Effect of Modern Agriculture)

खाद्यान्न उत्पादन में आधुनिक कृषि का अत्यधिक प्रभाव पड़ा और हम आज बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भोजन की व्यवस्था इसी आधुनिक कृषि के कारण ही कर पा रहे हैं। वैसे कृषि का इतिहास देखें तो हमें ज्ञात होता है कि आज कृषि तकनीक अपने चरमोत्कर्ष पर है। यदि हम वर्तमान युग को कृषि का ‘आधुनिक काल’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज कृषि की बहुत ही उज्जत तकनीक विकसित की जा चुकी है, पुरातन काल में कृषि अपने भोज्य पदार्थों को प्राप्त करने के लिए ही की जा सकती थी लेकिन आज भोजन प्राप्ति का साधन तो है लेकिन इसे व्यवसाय के रूप में किया जा रहा है। आज पौधों की तथा पशुओं की कई उन्नत किस्में विकसित हुई हैं। इसका परिणाम खाद्यान्न समस्या हल करने में रहा।

आधुनिक कृषि का किस प्रकार प्रभाव पड़ा है इसका उदाहरण हम अपने ही देश में देख सकते हैं। 1931 के बाद की बढ़ती हुई जनसंख्या ने हमारे खाद्यान्न समस्या उत्पन्न कर दी थी। हमारे देश में 1901 में गेहूँ का औसत उत्पादन 789 किग्रा. हैक्टेयर एवं चावल का उत्पादन 1050 किग्रा. या जो सन 1952 में घटकर 645 किग्रा. हैक्टेयर एवं 800 किग्रा. हैक्टेयर हो गया था। लेकिन 1952 से हमारी कृषि तकनीक में बहुत से परिवर्तन हुए और आधुनिक कृषि का यह परिणाम रहा कि आज दोनों धान्यों का उत्पादन क्रमशः 1400 किग्रा. हैक्टेयर एवं 1800 किग्रा. हैक्टेयर हो गया।

आजादी के बाद से ही हम प्रयासरत थे कि हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो जायें। इसके लिए ‘हरित क्रान्ति का सपना देखा गया। कृषि व्यवस्था सुदृढ़ करने के लिए गहन कार्यक्रम चलाये गये जिसमें से प्रमुख कार्यक्रम ‘गहन कृषि क्षेत्रीय कार्यक्रम’ (Intensive Agriculture Area Programme) था। आधुनिक कृषि में उत्पादन क्षमता तो बढ़ी ही साथ में हमें और भी कई क्षेत्रों में सफलता मिलीं, जो अग्रानुसार है

(1) उच्च उत्पादक प्रजातियों (High yielding varieties) का आविष्कार हुआ।

(2) नये उर्वरक बनाये गये एवं सिंचाई सुविधा विकसित की गई जिससे वर्ष में एक से अधिक फसल प्राप्त की जा सकी।

(3) बीमारियों एवं कीटरोधी जातियों का विकास किया गया।

(4) आम किसानों द्वारा भी वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया गया।

3. उर्वरक एवं कीटनाशी की समस्या (Fertilizer and Pesticide Problems) खाद्यान्न समस्या को कम करने के लिए यह आवश्यक था कि हम उत्पादन दर बढ़ायें। फसलों को उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि वहाँ की भूमि उपजाऊ हो। लेकिन हम सभी जानते हैं कि सभी स्थानों की भूमि एक समान उपजाऊ नहीं हो सकती इसलिए उत्पादन सभी जगह एक समान नहीं हो सकता। इस कमी को दूर करने के लिए हमने भूमि में पोषक पदार्थों से युक्त रासायनिक यौगिक डाले जिसे हम ‘रासायनिक उर्वरक’ (Fertilizer) कहते हैं। इस प्रकार इन रासायनिक उर्वरकों का उपयोग धीरे-धीरे बढ़ता गया और आज स्थिति यह है कि बिना रासायनिक उर्वरक के हम खेती कर ही नहीं सकते। इसका हमको एक ओर तो अत्यधिक फायदा यह हुआ कि हमारी उत्पादन दर बहुत अधिक बढ़ गई, लेकिन लाभ की हमें अब बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है क्योंकि हम रासायनिक उर्वरकों से हमें अब बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। इन रासायनिक यौगिकों से अत्यधिक प्रदूषण हो रहा है। हमारे खाद्यान्नों का पोषण-स्तर गिर रहा है, साथ ही जल प्रदूषण भी फैल

रहा है। ऐसी ही परिस्थितियाँ कीटनाशकों के उपयोग से पैदा हो रही है। फसलों को होने वाले विभिन्न रोगों से बचाने के लिए हमने कुछ रसायनों का निर्माण किया जो कुछ सीमा तक विषाक्त थे। आज इन्हीं रसायनों के प्रयोग से हमें अत्यधिक हानियाँ हो रही है। कुछ हामियाँ तो यहाँ तक है कि इससे

पारिस्थितिक तन्त्र ही अव्यवस्थित हो गये; जैसे-DDT एक सामान्य कीटनाशी है। ये निरंतर उपयोग से धीरे-धीरे पानी में पहुँच जाता है। यहाँ मछलियों की त्वचा में ये एकत्र होता है। जब विभिन्न पक्षी इन मछलियों को खाते हैं तो ये उनके शरीर में चले जाते हैं। वहाँ इनका यह प्रभाव होता है कि इनके अण्डे के चारों ओर कवच नहीं बन पाता जिससे इनके भ्रूण का विकास नहीं हो पाता। प्रकृति में इसी प्रक्रिया के कारण कई पक्षियों की जातियाँ विलुप्त होने को है। इसी कारण से बहुत से विकसित देशों में DDT के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। हमारे देश में भी कुछ कीटनाशकों पर प्रतिबन्ध है जबकि कीटनाशकों को बेचने के लिए विशेष अनुज्ञा दी गई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रासायनिक उर्वरक, कवकनाशक एवं कीटनाशक इत्यादि के प्रयोग से हमें लाभ तो सीमित होते हैं लेकिन इससे हानियाँ बहुत अधिक होती हैं। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम इनका विकल्प ढूँदें जिससे इसका लाभ तो मिले लेकिन हानि न हो।

4. लवणता (Salinity)

कृषि भूमि में उर्वरकता कम होने का एक प्रमुख कारण लवणता है। लवणता का अर्थ होता है-लवणों अर्थात् अकार्बनिक रसायन; जैसे-सोडियम फ्लोराइड, मैग्नीशियम फ्लोराइड इत्यादि का अत्यधिक होना। भूमि में यदि लवणों की मात्रा अधिक हो तो उस भूमि में उत्पादकता कम हो जाती है। इसलिए भूमि में लवणता का बढ़ना कृषि के लिए नुकसानदेह है।

समुद्रों के किनारों के क्षेत्रों की भूमि में लवणता अधिक होती है। इसका कारण यह होता है कि समुद्रों का जल (जिसमें लवणों का सान्द्रण अत्यधिक होता है) भूमिगत जल स्रोत से मिल जाता है और धीरे-धीरे रिसता हुआ भूमि में चला जाता है। परिणामस्वरूप उस भूमि में लवणता बढ़ जाती है। दूसरा एक कारण और होता है भूमि में लवणता के बढ़ने का, वह यह है कि जब ऐसे भूमिगत जलस्रोत का उपयोग जिसमें लवण उपस्थित है (सामान्यतः भूमिगत स्रोत में लवण उपस्थित होते हैं) उसका प्रयोग यदि सिंचाई के रूप में किया जाये तो उस कृषि भूमि पर लवणता बढ़ जाती है। इस प्रकार ये भूमि अनुपयोगी हो जाती है। अतः हमें ऐसे जल से खेतों में सिंचाई नहीं करनी चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि भूमि में लवणों की मात्रा न बढ़ने पाये।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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