भारत में मौलिक आवश्यकता मूलक मानव अधिकारों के रूप में राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

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संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निदेशक तत्व का उल्लेख किया गया है। नीति निदेशक तत्वों में वे उद्देश्य एवं साक्ष्य निहित हैं जिनका पालन करना राज्य का कर्तव्य है। संविधान की प्रस्तावना में परिकल्पित लोकहितकारी राज्य एवं एक-समाजवादी समाज की स्थापना का आदर्श तभी प्राप्त किया जा सकता है जब कि सरकार नीति निदेशक सिद्धातों को लागू करने का प्रयत्न करे। आज हम एक लोक कल्याणकारी राज्य के नागरिक है, जिसका कर्त्तव्य जनसाधारण के सुख एवं समृद्धि की अभिवृद्धि करना है। इसी उद्देश्य से नीति निदेशक सिद्धान्तों में कुछ आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों को निहित किया गया है जिसका पालन राज्यों को करना अभीष्ट है।

नीति निदेशक तत्वों में वे आदर्श निहित हैं जिनको प्रत्येक सरकार अपनी नीतियों के निर्धारण और कानून बनाने में सदैव ध्यान में रखेगी। इससे वे आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक सिद्धान्त अन्तर्निहित हैं जो भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुकूल हो।

भाग 4 में निम्न निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है- इस भाग में अन्तर्विष्ट तत्वों का लागू होना (अनु. 37)-इस भागे में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनी नहीं होंगे किन्तु फिर भी इनमें अधिकथित तत्व देश के शासन में मूलभूत है, और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्त्तव्य होगा। राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा (अनु. 38 ) –

(1) राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था करेगा, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोककल्याण की अभिवृद्धि का प्रयत्न करेगा। (2) राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल

व्यक्तियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समान करने का प्रयास करेगा।

राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्व (अनु. 39)-राज्य अपनी नीति के विशिष्टतया इस प्रकार संचालित करेगा कि सुनिश्चित रूप से (क) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो;

(ख) समुदायव के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बॅटा है जिससे  सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो;

(ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन साधनों के सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेन्द्रण न हो;

(घ) पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन हो;

(ङ) पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो;

(च) बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएँ दी जाएँ और बालकों और अल्पवय व्यक्तियों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाए।

समान न्याय और निःशुक्ल विधिक सहायता (अनुच्छेद 39 )-राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि

विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह, विशिष्टतया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक व किसी अन्य निर्योग्यतम के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रखा जाए, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।

ग्राम पंचायतों का संगठन (अनु. 40)-राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए कदम उठाएगा और उसको ऐसी शक्तियाँ और प्राधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक हों।

कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार (अनु. 41)-राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर, काम पाने के शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता तथा अन्य अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।

छः वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था की देखरेख एवं शिक्षा के लिए प्रावधान (अनु. 42) राज्य छः वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के पूर्व बाल्यकाल की देखरेख और शिक्षा देने का प्रयास करेगा।

काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता उपबंध (अनु. 42 )-राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबन्ध करेगा। कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि (अनु. 43 )-राज्य, उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मजदूरी, शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश का सम्पूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएँ तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सहकारी आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा। उद्योग के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना (अनुच्छेद 43 क)-राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।

अनुसूचित जातियों, अनूसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी

हितों की अभिवृद्धि (अनु. 46 )-राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और सम्बन्धी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनका संरक्षण करेगा।

पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्त्तव्य (अनु. 47 )-राज्य अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।

कृषि और पशुपालन का संगठन (अनु. 48 )-राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिये और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठायेगा।

पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन तथा वन और वन्य जीवों की रक्षा (अनु. 48 ) – राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण (अनु. 49)-संसद द्वारा बनाई गई विधि या उसके अधीन राष्ट्रीय महत्व वाले घोषित किये गये कलात्मक व ऐतिहासिक अभिरुचि वाले प्रत्येक संस्मारक या स्थान या वस्तु का यथास्थित लुंठन, विरूपण, अपसारण, व्ययन या निर्यात से संरक्षण करना राज्य की बाध्यता होगी।

कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण (अनु. 50)-राज्य की लोक सेवाओं में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिये राज्य कदम उठायेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि (अनु. 51 )-राज्य (क) अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाए रखने का, (ग) संगठित लोगों के एक दूसरे से व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और संधियों, बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और (घ) अंतर्राष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थ द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा। संविधान के भाग 4 (निदेशक तत्वों) का महत्व हमारे संविधान में राज्य की नीति के निदेशक तत्वों की परिकल्पना आयरलैण्ड के संविधान को ध्यान में रखते हुए की गई है। संविधान सभा में निदेशक तत्वों का समर्थन करते हुए डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने इस प्रकार कहा था

“मेरी विवेक बुद्धि से, निदेशक तत्वों का बड़ा महत्व है, क्योंकि वे अधिकचित करने हैं कि हमारा आदर्श आर्थिक लोकतंत्र है। कारण यह है कि हम संविधान में उपबंधित विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से केवल संसदीय प्रणाली की सरकार का, बिना किसी निदेशक के कि हमारा आर्थिक आदर्श, कि हमारी सामाजिक व्यवस्था क्या होनी चाहिए, स्थापित किया जाना नहीं चाहते हैं, इसलिए हम लोगों ने जानबूझकर निदेशक तत्वों को संविधान में सम्मिलित कर दिया।”

निदेशक तत्व किसी भी प्रकार से मूल अधिकारों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। ग्रेनविल ऑस्टिन ने निदेशक तत्वों की महत्ता को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है-“भारतीय संविधान प्रथमतः और सर्वोपरि रूप में एक सामाजिक दस्तावेज है। इसके अधिकांश उपबन्ध या तो प्रत्यक्षतः सामाजिक क्रान्ति के उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यक दशाओं की स्थापना करते हुए सामाजिक क्रान्ति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए या तो सीधे उपबन्धित हैं, या फिर सम्पूर्ण संविधान में राष्ट्रीय पुनर्जागरण का लक्ष्य व्याप्त होते हुए भी सामाजिक क्रान्ति के लिए वचनबद्धता का जो मर्म है, वह भाग 3 और 4 के मूल अधिकारों तथा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में है। यह संविधान की आत्मा है।”

चूँकि निदेशक तत्व भी संविधान में निहित हैं, इसलिए सरकार का यह कर्त्तव्य है कि इनको लागू करे। यह सच है कि इसके पीछे कोई विधिक शक्ति नहीं है, किन्तु इसके पीछे ‘जनमत’ की महान् शक्ति है। कोई भी सरकार, जो अपना भविष्य सर्वदा के लिए अन्धकारमय नहीं बनाना चाहती, इन निदेशों की उपेक्षा करने का साहस नहीं करेगी। उपरोक्त विस्तृत विवेचन से स्पष्ट है कि “भारतीय संविधान के भाग-4 में वर्णित राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्त मौलिक आवश्यकता मूलक मानव अधिकार है।”

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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