भूकम्प आपदा को समझाइए तथा भूकम्प आपदा प्रबन्ध के उपायों की विवेचना कीजिए।

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भू-पटल को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक शक्तियों में भूकम्प एक यकायक उत्पन्न होने वाली सर्वाधिक शक्तिशाली शक्ति है। भूकम्प, धरातल के वे कम्पन होते हैं जो प्राकृतिक शक्तियों के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं।

प्राकृतिक आपदाओं में भूकम्प सर्वाधिक हानिकारक व विनाशकारी माने जाते हैं। भूकम्प के आने से पूर्व न तो कोई चेतावनी मिलती है और न ही इसके आने के समय के बारे में वैज्ञानिक कोई स्पष्ट भविष्यवाणी कर सकते हैं। इसी कारण भूकम्प आपदा से होने वाली हानियों से बचने के लिए मानव के पास समय नहीं रहता। भूकम्प से होने वाले विनाशकारी प्रभावों को भूकम्प आपदा कहा जाता है।

भूकम्प आपदा प्रबन्धन (Earthquake Disaster Management)

भूकम्प से जन-धन की अपार क्षति होती है। भूकम्प का सर्वाधिक प्रभाव मानवीय बस्तियों पर पड़ता है। भूकम्प आने के कुछ मिनट के अन्दर ही भवन खण्डहरों में बदल जाते हैं, अनेक लोग काल-कलवित होते हैं या घायल हो जाते हैं। करोड़ों रुपये की सम्पत्ति क्षण भर में पूर्णतया नष्ट हो जाती है। रेल की पटरियाँ उखड़ जाती हैं। सड़कों पर जगह-जगह दरारें पड़ जाती है। दूरसंचार सेवायें भी भंग हो जाती हैं। वस्तुतः प्राकृतिक आपदाओं में भूकम्प एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जो सर्वाधिक विनाशकारी होती है।

भूकम्प आपदा प्रबन्धन के उपाय (Measures of Earthquake Disaster Management)

इस वाली हानियों आपदा के प्रबन्धन के द्वारा भूकम्प के आने को तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन भूकम्प को कम अवश्य किया जा सकता है। भूकम्प आपदा प्रबन्धन हेतु निम्न उपाय प्रमुख हैं से होने

(1) वैज्ञानिकों द्वारा भू-पटल की दृष्टि से अति संवेदनशील भू-भागों तथा मध्यम संवेदनशील भू-भागों का पता लगाया जा चुका है। अतः भूकम्प की दृष्टि से अतिसंवेदनशीलता मध्यम संवेदनशील क्षेत्रों में भवन निर्माण करते समय ऐसी तकनीक के उपयोग को अनिवार्य कर दिया जाये जिससे निर्मित भवनों पर भूकम्प का न्यूनतम प्रभाव पड़े।

• गुजरात राज्य के भुज क्षेत्र में आये भूकम्प के प्रभाव से हजारों लोग काल-कवलित हो गये। इनमें अधिकांश लोग भवनों के ढहने से व उनमें दबने से मरे। यदि ऐसे क्षेत्रों में भूकम्परोधी भवनों का निर्माण अनिवार्य कर दिया जाये तो भविष्य में भूकम्प से होने वाली जन-धन हानि को काफी कम किया जा सकता है।

(2) भूकम्पीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में आवश्यक स्थलों पर भूकम्प चेतावनी यन्त्र स्थापित कर दिये जायें तो भूकम्प आने के संकेत मिलते ही चेतावनी साइरन बजाने की व्यवस्था की जाये। इससे भूकम्प से होने वाली जन-धन की हानि को काफी कम किया जा सकता है।

(3) भूकम्पीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में आम आदमी को भूकम्प आने पर अतिशीघ्रता से अपने आवास को छोड़कर खुले भू-भागों में आ जाना चाहिये।

(4) भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में यथाशीघ्र राहत एवं बचाव कार्य प्रारम्भ कर देने चाहिये। मलबे में दबे लोगों को मलबे से निकालने के लिये भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में आधुनिक मशीनों की पर्याप्त उपलब्धता रहनी चाहिये । भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में जहां कहीं भी आग लगी हो उसे तुरन्त बुझाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

(5) भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में मलबे की यथाशीघ्र सफाई करा देनी चाहिये।

(6) भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों में स्वचलित चिकित्सा सुविधाओं की पर्याप्त व्यवस्था प्रदान की जानी चाहिए।

(7) खाद्य सामग्री व शुद्ध पेयजल आपूर्ति के पर्याप्त प्रबन्ध सुनिश्चित किये जायें।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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