“पर्यावरण प्रदूषण ने मानव समाज को रोगग्रस्त कर दिया है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।

0
269

पर्यावरण के सन्दर्भ में पूर्व के वर्णन से यह बातें स्पष्ट है कि हमारे चारों ओर का वातावरण पर्यावरण कहलाता है और हम स्वयं भी पर्यावरण के अंग है। लेकिन एक विशेषता मनुष्य में अन्य जीवों से यह है कि वह पर्यावरण का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करता है और अपने इस स्वार्थ के कारण वह यह नहीं सोचता कि यदि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित हो जायेंगे तो स्वयं उसके लिए समस्या खड़ी करेंगे। आज हम इन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं कि हमारे संसाधन ही प्रदूषित होकर हमारे जीवन के लिए खतरा बन रहे हैं। आज सबसे ज्वलन्त विषय पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य का है जिसकी सभी ओर चर्चा ही नहीं हो रही है बल्कि सारा विश्व इससे चिन्तित है।

पर्यावरण के सभी कारक; जैसे—जल, वायु, भूमि इत्यादि सभी आज प्रदूषित हो चुके हैं और अत्यधिक उपभोग के कारण प्रतिक्रियात्मक मनुष्य के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डाल रहे हैं। यहाँ हम इन तथ्यों का उल्लेख करेंगे कि कैसे ये पर्यावरणीय कारक मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं। मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव डालने पर्यावरण प्रदूषित कारक निम्नानुसार हैं-

(1) जल प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव, (2) वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव,

(3) भूमि प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव, (4) शोर प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव।

जल प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effect on Human Health of Water Pollution )

जल सभी जीवों का आधार है। अतः इसके प्रदूषित होने से मनुष्य भी बच नहीं सकता। प्रदूषित जल मानव स्वास्थ्य पर निम्नानुसार हानिकारक प्रभाव डालता है

(1) पेयजल के द्वारा, (2) जल सम्पर्क के द्वारा, (3) जल में उपस्थित रासायनिक पदार्थों के द्वारा।

(1) पेयजल के द्वारा दूषित जल में विभिन्न प्रकार के रोगाणु; जैसे—बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ इत्यादि होते हैं। जब यह दूषित जल किसी तरह पेयजल में मिल जाता है तो विभिन्न प्रकार

की बीमारियाँ फैलती हैं। इस प्रकार से होने वाले बीमारियों को जलवाहित रोग (Water born (disease) कहते हैं। सामान्य रूप से निम्नलिखित रोग जलवाहित रोग होते हैं-

(i) हैजा (Cholera), टाइफाइड (Typhoid), पेचिस (Dysentry) ये जल में उपस्थित बैक्टीरिया के द्वारा फैलते हैं। (ii) यकृत शोथ पीलिया (Hepatitis), पोलियो (Polio) ये बीमारियाँ जल में उपस्थित वायरस के कारण फैलती हैं। पीलिया का सबसे अधिक फैलाव जल के द्वारा ही होता है। यमुना नदी के प्रदूषित जल से 1951-56 के बीच लगभग 40,000 लोगों को पीलिया हुआ वैसे ही 1978 में मुम्बई में प्रदूषित जल से लगभग 2,000 लोगों को पीलिया हुआ था।

(iii) कुछ बीमारियाँ पानी में पाये जाने वाले प्रोटोजोआ के कारण होती हैं; जैसे—अमीबिक अतिसार (Amoebic dysentry), अमीबिक यकृत एप्सिस (Amoebic liver apsis) इत्यादि। (iv) कुछ कृमि भी पानी के द्वारा शरीर में पहुँचकर परजीवी के रूप में रहकर हानि पहुँचाते हैं; जैसे-एस्केरिस (Ascaris) एवं फीताकृमि (Tapeworm)।

(2) जल सम्पर्क के द्वारा हमारे यहाँ विशेषकर ग्रामीण अंचलों में नदी, नाले या तालाब का सार्वजनिक नहाने-धोने के लिए उपयोग किया जाता है जिसके फलस्वरूप किसी रोगी व्यक्ति के रोगाणु इस जल के द्वारा रोग का फैलाव करते हैं। इस जल सम्पर्क से होने वाली बीमारियाँ इस प्रकार है- नारू (Schistosomiassis), एनकायलो स्टोमियेसिस (Ankylo stomiasis), स्ट्रॉन्जिलोएडियेसी (Strongloidiasis), लेप्टोस्पाइरोसिस (Leptospirosis) इत्यादि ।

(3) जल में उपस्थित रासायनिक पदार्थों के द्वारा-जल के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण उसमें रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ना है और यह बढ़ी हुई रासायनिक पदार्थों की मात्रा मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है। जैसे जल में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला फ्लोराइड तत्व दाँतों के लिए लाभदायक है। लेकिन इसकी मात्रा 1 मिग्रा/लिटर से अधिक होने पर यह लाभ के बजाय हानिकारक हो जाती है।

इसी प्रकार रासायनिक उर्वरक से नाइट्रेट पेयजल से मनुष्य के शरीर में पहुँचते हैं जहाँ नाइट्राइट में परिवर्तित होकर हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर उसकी ऑक्सीजन वहन की क्षमता कम कर देते हैं। इसी प्रकार कीटनाशी में प्रयुक्त रसायन; जैसे-डी. डी. टी., पारा, लेड, आर्सेनिक विभिन्न भोजन श्रृंखला से होते हुए मनुष्य में पहुँचकर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effect on Human Health of Air Pollution )

वायु को प्राण कहा गया है अर्थात् बिना वायु के जीवन ही नहीं है। मनुष्य बिना वायु के कुछ (के क्षण भी जीवित नहीं रह सकता लेकिन आज यही वायु इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि यह स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालने लगी है।

वायु का उपयोग मनुष्य श्वसन के लिए करता है। इसलिए प्रदूषित वायु का सीधा असर श्वसन तन्त्र पर पड़ता है। इनसे सामान्य रूप से होने वाली बीमारियाँ है श्वसनी शोय (bronchitis), बिसिनोसिस (bissynosis), गले का दर्द, निमोनिया, फेफड़े का कैंसर इत्यादि। इसके अलावा भी बहुत सी बीमारियाँ वायु प्रदूषकों के कारण होती हैं, जैसे-वायु में उपस्थित लेड (सीसा) तत्व हमारे शरीर में पहुँचकर यकृत तथा वृक्क ऊतकों की क्षति, आहारनाल की क्षति, मस्तिष्क विकार, हड्डियों का गलना, वयस्कों की उर्वरक क्षमता को कम करना इत्यादि नुकसान पहुँचाता है। इसी प्रकार वायु में सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की अधिकता कैन्सर, हृदय रोग, मधुमेह इत्यादि के कारण बनते हैं। इन सभी गम्भीर रोगों के अलावा कुछ सामान्य विकार भी प्रदूषित वायु से होते हैं; जैसे—आँखों में दर्द होना, सिर में दर्द होना, चक्कर आना तथा सर्दी-खाँसी इत्यादि। भूमि प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effect on Human Health of Soil )

भूमि पर मानव का विकास होता है इसलिए ये प्रत्यक्ष हानिकारक प्रभाव न डालते हुए अप्रत्यक्ष तौर से हानिकारक प्रभाव डालते हैं। इससे स्वास्थ्य पर होने वाले हानिकारक प्रभाव निम्नानुसार हैं (1) आवास स्थान के आस-पास कूड़ा एकत्र करने से धीरे-धीरे गन्दगी बढ़ती जाती है जिससे वहाँ पर मच्छर, मक्खी इत्यादि रोगवाहकों की संख्या बढ़ती है साथ ही इस गन्दगी में बीमारी फैलाने वाले रोगाणुओं की संख्या भी बढ़ती है जिससे पेचिश, आंत्रशोथ, मोतीझरा, कंजक्टीवीटिस ( conjunctivitis) तपेदिक इत्यादि रोग फैलते हैं।

(2) घरों से निकलने वाले सीवेज का प्रबन्धन ठीक नहीं होने पर एक स्थान पर एकत्र होकर दलदल बन जाते हैं जहाँ रोगवाहक तथा रोगकारकों की संख्या बढ़ती है। (3) सामान्यतः औद्योगिक अपशिष्टों को बिना उपचारित कर भूमि पर ऐसे ही डाल दिया जाता है जिससे उसमें स्थित विभिन्न हानिकारक तत्व एवं यौगिक भूमि में पहुँचकर अप्रत्यक्ष रूप से हानि पहुँचाते हैं।

शोर प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effect on Human Health of Noise Pollution )

हमारे वातावरण में विशेषकर सही वातावरण में आज शोर प्रदूषण एक समस्या है। शोर का प्रभाव मानव पर विभिन्न प्रकार से पड़ता है। शोर का शारीरिक प्रभाव तो होता ही है साथ ही यह एक ऐसा वातावरणीय कारक है जिसका मानसिक प्रभाव भी पड़ता है। इसका मानव पर निम्नानुसार हानिकारक प्रभाव पड़ता है

(1) ध्वनि श्रवण स्तर पर, (2) कार्यकीय स्तर पर, (3) मानव आचरण के स्तर पर

(1) ध्वनि श्रवण स्तर पर-शोर का सीधा असर कानों पर पड़ता है। अत्यधिक शोर में लगातार रहने से हमारी श्रवण शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है। प्रयोगों द्वारा यह देखा गया कि 80 डेसीबल से अधिक के शोर से श्रवण हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है। इसी प्रकार ध्वनि की तीव्रता अधिक होने से हमें अन्य शारीरिक नुकसान भी उठाने पड़ते हैं; जैसे—155 डेसीबल की ध्वनि त्वचा को जला सकती है, 180 डेसीबल से अधिक की ध्वनि से मृत्यु तक हो जाती है।

(2) कार्यकीय स्तर पर हमारी धारणा पहले यह थी कि शोर से केवल श्रवण शक्ति को ही नुकसान होता है लेकिन वर्तमान शोधों से यह बातें सामने आई हैं कि शोर अतिरिक्त हृदय, तन्त्रिका तन्त्र, पाचन तन्त्र इत्यादि पर भी प्रभाव पड़ता है जिसके फलस्वरूप हृदय श्रवण शक्ति के शति में बढ़ोत्तरी, रक्तचाप का बढ़ना, त्वचा का ढीला पड़ना, आँखों की पुतलियों का प्रसार, इत्यादि प्रभाव दिखाई देते हैं। प्रसिद्ध पर्यावरणशास्त्री डॉ. सेमुअल रोजन (Samuel Rosen) ने बहुत अच्छे शब्दों में शोर-प्रभाव को व्यक्त किया है। यह वाक्य है—“आप चाहें तो शोर को क्षमा कर दें पर आपकी धमनियाँ शोर को क्षमा नहीं करेंगी।”

(3) मानव आचरण के स्तर पर-शोर का शारीरिक प्रभाव के अतिरिक्त मानसिक प्रभाव भी पड़ता है जिसे दैनिक जीवन में सामाजिक तनावों, मानसिक अस्थिरता, कुण्ठा, पागलपन इत्यादि दोषों का कारण माना जाता है। विमानतल के समीप स्थित बस्तियों में मानसिक रोगों की बहुलता अधिक होती है। शोर के प्रभाव का वर्णन करते हुए ऑस्ट्रिया के विद्वान ने कहा है कि “शोर मनुष्य को समय से पूर्व ही बूढ़ा कर देता है।”

इस प्रकार देखते हैं कि जिस वातावरण में मनुष्य जाति का विकास हुआ, जिस पर्यावरण उसे पाला-पोसा, आज पर्यावरण उसके लिए हानिकारक बन गया है। हम यदि इसके कारणों को ढूँढ़ते हुए गहराई में जायें तो इसका कारण बहुत आसानी से समझ में आ जाता है कि हमने इस पर्यावरण का दोहन केवल अपने को लाभान्वित करने में किया। इस लाभ के पीछे हमने यह नहीं देखा कि पर्यावरण किस प्रकार नष्ट हो रहा है और नतीजा यह हुआ कि जीवन देने वाला पर्यावरण ही अब जीवन लेने लगा है, लेकिन अभी भी समय है, हमको यह समझना होगा कि इस पर्यावरण का हम इस प्रकार उपभोग करें कि वह न तो नष्ट हो और न ही प्रदूषित हो। ऐसा हो तो यह पर्यावरण हमें जीवनदायक के रूप में दिखलाई देगा।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here