सूखा-कारण एवं बचाव के उपाय

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देश के किसी-न-किसी भाग में अकाल अथवा सूखा पड़ना एक सामान्य सी बात है। सिंचाई आयोग ने उन क्षेत्रों को शुष्क माना है जहाँ वर्षा 10 सेमी से कम होती है और इसमें भी 75% वर्षा अनेक वर्षों तक प्राप्त नहीं होती और जहाँ कृषित क्षेत्र के 30% से भी कम भाग पर सिंचाई की सुविधाएँ पाई जाती हैं।

भारत में अनावृष्टि से प्रभावित क्षेत्रफल 10 लाख वर्ग किलोमीटर से कुछ अधिक है। आयोग ने अकालग्रस्त क्षेत्रों को दो भागों में बाँटा है

प्रथम, वे जो अकालग्रस्त हैं, जहाँ वर्षा में सामान्य से 25% तक परिवर्तन होता रहता है। ऐसे चार क्षेत्र है पश्चिमी

(i) गुजरात, राजस्थान, पंजाब के निकटवर्ती भाग, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश।

(ii) मध्य महाराष्ट्र, आन्तरिक कर्नाटक, रायलसीमा, दक्षिणी तेलंगाना और तमिलनाडु के कुछ भाग

(iii) उत्तरी-पश्चिमी बिहार का कुछ भाग तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग (जैसे- मिर्जापुर का पठार), तथा

(iv) पश्चिमी बंगाल से लगे उड़ीसा का कुछ भाग (पालामऊ प्रदेश)। दूसरे, वे जो स्वभावतः लम्बे समय से अकालग्रस्त रहते हैं जहाँ सामान्य वर्षा में 25% से भी अधिक अन्तर पाया जाता है। इनके अन्तर्गत पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र एवं कच्छ सम्मिलित हैं।

बचाव के उपाय-अकाल का सामना करने के लिए अग्र उपाय काम में लाये जा सकते हैं-

(1) सूखे क्षेत्रों में शुष्क कृषि प्रणाली द्वारा मोटे अनाज पैदा किये जाते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत गहरी जुताई की जाती है। नमी को सुरक्षित रखा जाता है तथा जल संग्रहण के लिए सामान्यतः सस्ते बाँध तैयार किये जाते हैं। सिंचाई प्रायः फुहारों के रूप में की जाती है।

(2) ऐसी फसलों एवं पौधों का उपयोग किया जाये जो सूखा सहन कर सकते हैं।

(3) भूमि में एक टन अनाज के पीछे लगभग 25 किलोग्राम नत्रजन दिया जाता है। दाल वाली फसलें; मूँगफली स्वतः ही नत्रजन प्राप्त कर लेती हैं।

(4) वर्षा के जल का व्यवस्थित रूप से अधिकतम उपयोग छोटे बाँध, हौज, तालाब, एनीकट, कुएँ अथवा मिट्टी के अवरोधक बाँध बनाकर किया जाता है। इनसे पक्की तली वाली नहरें निकालकर सिंचाई की जाती है।

(5) मिट्टी के संरक्षण के लिए ऊँचाई के सहारे में मेड़बन्दी करना, सीढ़ीदार खेत बनाना तथा खेत के किनारों पर वृक्षारोपण करना।

(6) सिंचाई की नहरों को पक्का बनाना जिससे भूमि में कम से कम जल रिस पाये।

(7) जिन क्षेत्रों में नमकीन मिट्टी पायी जाती है उनमें ड्रिप सिंचाई (drip irrigation) की प्रणाली अपनाकर पुनरुद्धार की गयी मिट्टी की फसलें पैदा की जायें।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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