जैव-विविधता के मूल्य एवं प्रकारों की चर्चा कीजिए।

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प्रकृति में करोड़ों प्रकार के जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे विद्यमान हैं। प्रत्येक प्रकार के पेड़-पौधे एवं जीव-जन्तुओं की बहुत सी प्रजातियाँ भी पर्यावरण में मौजूद है। इस प्रकार जैव-विविधता का तात्पर्य जैविक विपुलता से है। सर्वप्रथम वाल्टर जी. रोसेन (Walter G. Rosen, 1986) ने बायोडावर्सिटी (Biodiversity) शब्द का प्रयोग जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों की विपुलता के लिए किया था।

इस प्रकार, पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से किसी भी पारिस्थितिक तन्त्र, आवास स्थल एवं पौधों (Plants), जन्तुओं (Animals) एवं सूक्ष्मजीवों (Micro-organisms) के विभिन्न प्रकार एवं विभिन्नता (Variability) ही जैव-विविधता है। दूसरे शब्दों में, “जैव-विविधता विभिन्न प्रकार की जातियों की विपुलता है जो एक अन्योन्य क्रिया तन्त्र की भाँति एक निश्चित आवास स्थल पर पाये जाते हैं। ”

नगरीकरण एवं औद्योगिक सभ्यता के बढ़ते हुए प्रभावों के कारण आज प्रकृति में उपस्थित बहुत-सी प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है जिसके कारण उनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।

जैव-विविधता विश्व के सन्दर्भ में (Bio-Diversity: In Global Context)-

जैव-विविधता की कार्यिक भूमिका (Functional role) और उसके महत्व (Magnitude) के बारे में सूचनाओं का बहुत अधिक अभाव है। पृथ्वी पर लगभग 30 मिलियन जातियाँ पाई जाती हैं जिनमें से केवल 1.5 मिलियन को ही नाम दिया गया है और इनका विवरण दिया गया है। जैव वैज्ञानिकों ने जाति विविधता (Species distribution) के विश्व वितरण में बहुत अधिक असमानता

उपोषण / उष्णकटिबन्धीय (Tropical and sub-tropical) भागों में स्थित विकासशील देशों (Developing countries), में जैव-विविधता, शीतोष्ण (Temperate) भाग में स्थित औद्योगिक देशों (Industrial countries) की अपेक्षा अधिक विपुल (Richer) हैं। फसलों (Crops) और घरेलू जन्तुओं (Domesticated animals) के बेविलोवियन सैन्टर्स ऑफ डाइवर्सिटी (Bavilovian Centres (of Diversity) भी इन्हीं विकासशील देशों में स्थित हैं।

भारतवर्ष के पेनिनसुलर क्षेत्र (दक्षिण भारत) में उपस्थित पश्चिमी घाट (Western Valley) जैव-विविधता के प्रमुख स्थल है तथा यहाँ पर भारतवर्ष में पाये जाने वाले पुष्पीय पौधों की 15,000

प्रजातियों में से लगभग 5,000 प्रजातियाँ अकेले केरल में पश्चिमी घाट में ही उपस्थित है। इसी प्रकार भारतवर्ष में उपस्थित समस्त जन्तु प्रजातियों में से लगभग 33% जन्तु अकेले केरल के पश्चिमी घाट में ही पाये जाते हैं।

जैव-विविधता के स्तर या प्रकार (Levels or Types of Biodiversity)

जैव-विविधता के तीन स्तर या प्रकार होते हैं-

(1) प्रजाति विविधता (Species Diversity)-इसी प्रकार की जैव-विविधता एक विशिष्ट क्षेत्र में विभिन्न प्रजाति के जीवों के मध्य (between species) में पायी जाती है। ऐसी विविधता ज्ञात करने के लिए उस स्थान पर उपस्थित सभी प्रजातियों की संख्या की गिनती कर ली जाती है।

(2) आनुवंशिक जैव-विविधता (Genetic Diversity) प्रजाति के जीवों में विविधता से सम्बन्धित होती है। इस प्रकार की जैव-विविधता एक

(3) पारिस्थितिक तन्त्रीय जैव-विविधता (Ecosystem Diversity) इस प्रकार की जैव-विविधता एक पारिस्थितिक तन्त्र के विभिन्न अंगों में उपस्थित जीवों में पाई जाती है। प्रत्येक पारिस्थितिक तन्त्र के विभिन्न भागों की जैव-विविधता भिन्न-भिन्न होती है।

जैव-विविधता का महत्व या मूल्य (Significance or Value of Biodiversity)

(1) पारिस्थितिक तन्त्र का स्थायित्व प्रारम्भ में पर्यावरण वैज्ञानिक (Ecologist) का विचार या कि प्रजाति-विविधता (Species diversity) या जैव विविधता पर्यावरण तन्त्र (Ecosystem) के स्थायित्व (Stability) से सम्बन्धित होती है। दूसरे शब्दों में, जीव-मण्डल (Biosphere) का स्थायित्व (Stability) जैव-विविधता पर निर्भर होती है, परन्तु आज यह स्पष्ट हो चुका है कि पर्यावरण तन्त्र का स्थायित्व उसके अजैविक स्थायित्व (Abiotic stability) पर निर्भर होती है। इस प्रकार जैव-विविधता पर्यावरण तन्त्र या जैव-मण्डल को स्थायित्व प्रदान करती है। जब अजैविक घटकों (Abiotic components) जैसे-जलवायु, पानी, मृदा, वायु की रासायनिकता (Chemistry of air) में किसी प्रकार का उतार-चढ़ाव (Fluctuation) होता है, तब उस स्थान की जैव-विविधता प्रभावित होती है। अतः पर्यावरण तन्त्र के स्थायित्व में प्रभाव पड़ता है।

(2) मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति-जैव-विविधता मनुष्य के लिए विभिन्न प्रकार से उपयोगी है, ऐसे जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों का प्रमुख स्रोत होता है, जिन पर मानव जाति भोजन (Food), ईंधन (Fuel), रेशा (Fibre), औषधि (Medicine) एवं आवास (Shelter) आदि के लिए निर्भर है।

(3) पोषक पदार्थों का चक्रण एवं पुनर्चक्रण-नम उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों (Wet tropical area) में पायी जाने वाली उच्च जैव विविधता (Higher Biodiversity) पोषक पदार्थों के चक्रण (Cyeling) एवं पुनर्चक्रण (Recycling) में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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