भारतीय संविधान के अन्तर्गत दिए गए मौलिक कर्त्तव्यों की विवेचना कीजिए।

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प्रस्तावना (Introduction)

मानव मूल्यों के स्रोत क्या है ? मानव मूल्य कहाँ से निकलते हैं ? हम कहाँ से मूल्यों को प्राप्त करते हैं ? सैद्धान्तिक जीवन में मूल्य विचार और चेतना से उत्पन्न होते हैं, परन्तु व्यवहार में मूल्यों के स्रोत है संविधान (Constitution), संस्कृति (Culture) और धर्म। इनमें संस्कृति मूल्यों का सबसे बड़ा और प्रमुख स्रोत है। संसार में सभी लोग अपनी विशिष्ट संस्कृति से ही मूल्य प्राप्त करते हैं। संस्कृति के बाद धर्म मूल्यों का स्रोत है। हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और ईसाई धर्म अपने अनुयायियों को जीवन मूल्य बतलाते हैं। धर्म ग्रन्थों में जीवन मूल्यों का उल्लेख होता है। अन्त में प्रत्येक सभ्य देश का संविधान के मूल्य दिखलाता है, जिनको वह विशिष्ट समाज मानता है। भारत, अमेरिका तथा सभी सभ्य राष्ट्रों के संविधान जनतन्त्रीय मूल्यों और मानव अधिकारों को मानते हैं। आज विश्व में मानव मूल्यों का सबसे बड़ा और सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्रोत मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा है। इसे प्रत्येक सभ्य देश का संविधान स्वीकार करता है।

मूल कर्त्तव्य (Fundamental Duties)

1976 में 42वें संविधान द्वारा संविधान के भाग चार में ‘ए’ जोड़कर 10 मूल कर्त्तव्य शामिल किये गये प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे तथा राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रीय गीत का सम्मान करे, स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान स्थापित उच्च आदर्शों पर चले, राष्ट्र की एकता व अखण्डता की रक्षा करे, धार्मिक, भाषायी तथा क्षेत्रीय विभिन्नताओं से ऊपर उठकर सब लोगों में सद्भाव तथा भाई-चारे की भावनाओं को बढ़ावा दे, वन तथा प्राकृतिक वातावरण की रक्षा करे, जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाये तथा सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करे।

भारतीय संविधान द्वारा दिए गए मूल कर्त्तव्य (Fundamental duties given by the Indian Constitution)

(1) न्याय, स्वतन्त्रता, समानता तथा बन्धुत्व के आदर्श उस समय तक प्राप्त नहीं किये जा सकतें जब तक कि शिक्षा द्वारा नागरिकों में उनके महत्व के सम्बन्ध में समझ उत्पन्न न हो जाये। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के समय भारतीय समाज की बहुत दुर्दशा थी। यहाँ धार्मिक कट्टर पंथी थे, जाति-पाँति का बोलबाला था, स्त्रियों की हीन दशा थी, ऊँची जातियाँ, नीची जातियों पर अत्याचार कर रही थीं। अन्धविश्वास तथा धार्मिक कट्टरता चरम सीमा पर थीं। संविधान बनाते समय सदस्यों ने इन सब सामाजिक दोषों को ध्यान में रखा और इनको दूर करने के प्रयास को सफल बनाने के लिए नागरिक को यह चार मूल अधिकार दिये। यह चार अधिकार उन सब बातों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कि भारतीय समाज के लिए मूल्यवान हैं। यह निर्देशन सिद्धान्त है, आचरण के नियम हैं, सामाजिक जीवन के प्रमाप हैं तथा वह आधार है जिन पर भविष्य के कानून एवं विधान निर्माण किये जाने चाहिए। आज हमारा जीवन प्रत्येक पद पर उनसे प्रभावित है। हमें अपने को उस साँचे में ढालना है जो इन आदर्शों द्वारा निर्मित है। किन्तु ऐसा हम केवल शिक्षा की सहायता के द्वारा ही कर पायेंगे।

(2) सिद्धान्त तथा अभ्यास के बीच दूरी होती है। हमारे संविधान ने सैद्धान्तिक रूप में तो यह अदर्श दे दिये हैं जिनका अनुसरण करके हमारा समाज संसार में सर्वश्रेष्ठ बन सकता है और हमारा देश सबसे अधिक जनतांत्रिक तथा प्रगतिशील हो सकता है किन्तु उनका अभ्यास में लाना इस बात पर निर्भर है कि सरक, तथा जनता उनको इस प्रकार व्यावहारिक रूप में लाने के लिए जनता को शिक्षित करना आवश्यक है। जनता को इन आदर्शों के अर्थों को समझना होगा और उनके अनुरूप अपने जीवन को ढालना होगा।

(3) जनता को शिक्षित करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार इन आदर्शों के अनुरूप अवसर प्रदान करे। इससे तात्पर्य यह यह है कि सब नागरिकों के लिए शिक्षा की सुविधायें प्रदान की जायें। प्रत्येक व्यक्ति को प्रगति करने के समय अवसर प्रदान हो। अतएव हमारे संविधान की प्रस्तावना दो प्रकार के कर्त्तव्यों के शिक्षकों एवं प्रशासकों को सौंपती है। (i) जनता को शिक्षित किया जाये ताकि वह संविधान में जो आदर्श सम्मिलित किये गये हैं वह

उनकी समझ में आ जायें तथा उनको ऐसा प्रशिक्षण दिया जाये कि वह व्यावहारिक रूप से उन्हें अपने वास्तविक जीवन में अपनायें।

(ii) इस देश के नागरिकों को शिक्षा की सुविधायें उपलब्ध कराई जायें तथा सब वर्गों को सामाजिक उत्थान के लिए समान अवसर प्रदान किये जायें। अब हम एक-एक करके चारों मूल अधिकारों पर ध्यान देंगे तथा उनके शैक्षिक निहितार्थ पर प्रकाश डालेंगे।

(अ) न्याय (Justice)—–न्याय के मूल अधिकार से केवल यह तात्पर्य नहीं है कि किसी अदालत द्वारा न्याय किया जाये। न्याय की अवधारणा विस्तृत अर्थों में हमारे संविधान द्वारा अपनाई गई है। यह सब व्यक्तियों के बीच में तथा व्यक्ति एवं राज्य के बीच में न्यायपूर्ण सम्बन्धों की ओर

केन्द्रित है। संविधान न्याय को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक क्षेत्रों में प्रदान करने पर बल देता है। सामाजिक न्याय (Social Justice) सामाजिक न्याय से तात्पर्य है समाज में सबका बराबरी का स्थान यह प्रत्येक व्यक्ति को समाज में उचित स्थान प्राप्त करने का विश्वास दिलाता है। यह समान स्तर प्राप्त करने के लिए जो भी कठिनाइयाँ आती है उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है।

सामाजिक न्याय के मूल अधिकार को प्रभावशाली बनाने के लिए संविधान में यह धारा प्रस्तुत की गई है।

राज्य किसी भी नागरिक में भेद-भाव धर्म, प्रजाति, जाति, लिंग भेद या जन्म स्थान के आधार पर नहीं करेगा न ही इनमें से किसी के आधार पर कोई रुकावट या अयोग्यता जन आमोद-प्रमोद रेस्ट्राओं, दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों एवं नहाने के घाटों इत्यादि के उपयोग पर लगायेगा। किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने को बाध्य नहीं किया जायेगा। केवल राज्य ही अनिवार्य सेवा के लिए किसी को भी बाध्य कर सकेगा जैसा कि युद्ध के समय सैन्यीकरण और ऐसा केवल राष्ट्र के लिए बिना किसी प्रजाति या जाति के भेदभाव के होगा। कोई भी नागरिक धर्म, जाति या लिंग, जन्म स्थान या निवास स्थान के आधार पर राज्य की किसी भी सेवा में नियुक्ति के लिए अयोग्य नहीं समझा जायेगा।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यदि हमें शिक्षा सामाजिक न्याय के आदर्श के अनुरूप प्रदान करनी है तो हमें अपनी शैक्षिक संस्थाओं का संगठन इस प्रकार करना चाहिए कि उनके दरवाजे देश के किसी भी नागरिक के लिए सदैव खुले रहें। हमारे राष्ट्र में कोई शैक्षिक संस्था जो राज्य द्वारा संचालित है वह किसी विशेष धर्म, जाति या प्रजाति या क्षेत्र के लिए ही केवल आरक्षित नहीं की जा सकती। हमारे विद्यालयों में भी किसी प्रकार का भेदभाव समाज के विभिन्न वर्गों या जातियों में नहीं किया जा सकता है। संविधान में सब वर्गों के लिए राज्य सेवाओं में नियुक्ति को खोल देने का उद्देश्य उस समय ही पूरा हो सकता है जबकि सबको अपने आत्म विकास के लिए तथा ज्ञान वृद्धि के लिए अवसर प्राप्त हों। शिक्षा सस्ती होनी चाहिए ताकि धनी तथा गरीब सबको अपने विकास के लिए उचित अवसर प्राप्त हों। यदि किसी भी योग्य विद्यार्थी को साधनों के अभाव के कारण शिक्षा के अवसर प्रदान नहीं हो तो यह सामाजिक अन्याय संविधान की धाराओं के विरुद्ध होगा। सामाजिक न्याय यह भी स्पष्ट करता है कि यदि कोई भी अयोग्यता हरिजनों पर जबरदस्ती लगाई जायेगी तो यह कानून के खिलाफ होगी। हमारे संविधान ने एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन सामाजिक व्यवस्था में लाने की चेष्टा की है जबकि उसमें अस्पृश्यता को कानून द्वारा रोक देने का प्रावधान किया गया है। क्योंकि हरिजन तथा दूसरी पिछड़ी जातियों को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से दूसरी जातियों के स्तर तक उठाना आवश्यक समझा गया। इस कारण राज्यों को निर्देश दिये गये कि वह इस दिशा में विशेष कदम उठायें। इस प्रावधान की पूर्ति के हेतु ही राज्य सेवाओं में आरक्षण के सिद्धान्त को मान्यता दी गई।

(ii) आर्थिक न्याय (Economic Justice)— आर्थिक न्याय का मूल अधिकार यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक नागरिक को सम्पत्ति को अर्जित करने का, रखने का और उपयोग करने का अधिकार है एवं वह कोई भी व्यवसाय या व्यापार अपने विकल्प के अनुसार अपना सकता है। व्यवसाय या व्यापार की स्वतन्त्रता का स्पष्ट रूप से यह तात्पर्य है कि व्यक्ति को इस बात के अवसर मिलने चाहिए कि वह अपनी मर्जी के अनुसार किसी भी प्रकार का प्रशिक्षण प्राप्त कर सके। शैक्षिक दृष्टिकोण से इसका अभिप्राय यह है कि राज्य किसी को कोई वृत्ति चुनने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। राज्य का कार्य तो यह है कि वह सब व्यवसाय इत्यादि के लिए प्रशिक्षण की सुविधायें प्रदान करे और फिर व्यक्तियों को अपनी मर्जी के अनुसार व्यवसाय की स्वतन्त्रता दे। किन्तु इस अधिकार की कुछ सीमायें भी हैं। यदि सब व्यक्ति डाक्टर या इंजीनियर बनना चाहेंगे तो क्या इसकी अनुमति देगा। ऐसी स्थिति में राज्य को समाज कल्याण के दृष्टिकोण से बाधायें डालनी पड़ेंगी। केवल उतने ही डॉक्टर या

इंजीनियर प्रशिक्षित करने की सुविधायें प्रदान की जायेंगी जितने कि समाज की सेवा के लिए आवश्यक हैं तथा प्रार्थियों का चुनाव उनकी ऐसे प्रशिक्षण से लाभ उठाने की योग्यता के आधार पर किया जायेगा। सबको अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने के समान अवसर तो दिये जायेंगे किन्तु प्रशिक्षण के लिए उनका ही चुनाव होगा जो योग्यता के क्रम में सबसे श्रेष्ठ होंगे।

(iii) राजनैतिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति जो 18 वर्ष से अधिक आयु का है उसे वोट देने का अधिकार दिया गया है। वह राज्यसभा या लोकसभा के लिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव कर सकता है। यह प्रावधान वास्तव में देश में शिक्षा संगठन के सम्बन्ध में बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे संविधान के अनुसार प्रत्येक ऐसा भारत का नागरिक जो 18 वर्ष की आयु का हो चुका है और असामान्य नहीं है तथा किसी संगीन अपराध का मुलजिम नहीं है वह वोट देने का अधिकार रखता है। वह चाहे प्रशिक्षित हो, चाहे किसी धर्म या जाति या वर्ग का हो उसे यह अधिकार है। इस अधिकार ने शिक्षा एवं शिक्षकों के ऊपर जनतन्त्र के लिए उत्तम नागरिक बनाने का उत्तरदायित्व डाल दिया है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने तो प्रत्येक प्रौढ़ को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दे दिया है लेकिन इस अधिकार का सदुपयोग कैसे किया जा सकता है यह कार्य मतदाता के ऊपर छोड़ दिया। किन्तु अशिक्षित तथा ज्ञान रहित मतदाता को फुसलाया भी जा सकता है इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। फलस्वरूप हमारे देश के मतदान में बहुत से दोष प्रकट हो गये हैं। इन दोषों को शिक्षा द्वारा ही दूर किया जा सकता है। अतएव मतदाता को अपने मत देने के अधिकार का उचित उपयोग करना सीखना अत्यन्त आवश्यक है।

(ब) स्वतन्त्रता (Liberty)- हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को स्वतन्त्रता का अधिकार देता है, संगठन या एसोसिएशन बनाने का अधिकार है, सारे देश में स्वतन्त्रता से भ्रमण करने का; किसी भी देश के भाग में रहने का तथा निवास स्थान चुनने का अधिकार है। यह संपत्ति को अर्जित कर सकता है, रख सकता है, बेच सकता है या कोई भी वृत्ति अपना सकता है या कोई व्यवसाय या व्यापार कर सकता है। किसी व्यक्ति को सजा केवल कानून के अनुसार ही दी जा सकती है। प्रत्येक को अपने दृष्टिकोण को व्यवहार में लाने का प्रसार करने की स्वतन्त्रता है। प्रत्येक को अपनी निजी संस्कृति को अपने ढंग से बनाये रखने का अधिकार है। राज्य के फंड द्वारा संचालित शैक्षिक विद्यालयों में किसी भी धर्म का शिक्षण नहीं दिया जा सकता है। किसी को अपने धर्म के कारण किसी सार्वजनिक संस्था में प्रवेश से नहीं रोका जायेगा।

संविधान में उपरोक्त अधिकार नागरिक को प्रदान किये गये हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण अधिकार है। किन्तु उनका उचित उपयोग उस समय तक नहीं किया जा सकता जब तक कि व्यक्ति उनको उस भावना से ही ग्रहण करें जिससे वह प्रदान किये गये हैं। यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को वाणी की स्वतन्त्रता है। वह सरकार की परम्पराओं की, रूढ़िवादिता की, सामाजिक कुरीतियों की आलोचना कर सकता है किन्तु जब वह इस स्वतन्त्रता को राष्ट्र के विघटन के लिए, नागरिकों में धार्मिक अन्धेपन के लिए, विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रों, धर्मों के बीच में कटुता बढ़ाने के लिए प्रयोग करता है तो यह इन अधिकारों का दुरुपयोग है। इस प्रकार के दुरुपयोग को रोकने के लिए हमें नागरिकों को शिक्षित करना होगा। अच्छी शिक्षा ही धार्मिक अन्धविश्वास, कटुता तथा झूठे लांछन लगाने की प्रवृत्ति को रोक सकती है।

(स) समता (Equality) स्तर एवं अवसरों की समानता के बारे में बहुत कुछ हम पीछे सामाजिक न्याय के अन्तर्गत स्पष्ट कर चुके हैं। यह अधिकार देश के कानून के सम्मुख सदको बराबर मानने का है। प्रत्येक नागरिक को कानून का संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है। कानून किसी भी नागरिक के साथ जाति, वर्ग या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। कानून सबके लिए चाहे हिन्दू हो, मुसलमान हो, युवा हो, वृद्ध हो, स्त्री हो या पुरुष एक समान है।

समता का अधिकार उस समय ही कुछ अर्थ रखता है जबकि व्यक्ति इसको व्यवहार में लाने योग्य हों और वह इस योग्य शिक्षा द्वारा ही बनाये जा सकते हैं। (द) बन्धुत्व (Fratenity) यह अधिकार व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता को मान्यता देता है। स्वतन्त्रता, समता तथा न्याय के अधिकार संविधान में दिये गये हैं। किन्तु एक व्यक्ति की स्वतन्त्रता दूसरे की स्वतन्त्रता के बीच में रुकावट बन सकती है इसलिए कुछ सीमायें इन अधिकारों को व्यवहार में लाने पर जनहित के दृष्टिकोण से लगा दी गई जबकि मूल अधिकारों के प्रयोग में दूसरे व्यक्तियों की स्वतन्त्रता में रुकावट पड़ती है या वह समाज विरोधी है या वह अनैतिक है तो उन्हें व्यवहार में लाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हमारे संविधान में व्यक्ति की मान-मर्यादा को बहुत ऊँचा स्थान दिया गया है किन्तु यह राष्ट्र की एकता के बीच में रुकावट नहीं बन सकती है। व्यक्ति की मान-मर्यादा तथा राष्ट्र की एकता दोनों पर ही संविधान में बल दिया गया है और इसके लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर कुछ सीमा तक अंकुश हो । उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति अपनी मर्यादा का सहारा लेकर देश के विघटन के लिए विचार प्रतिपादित नहीं कर सकता।

शिक्षा का कार्य नई पीढ़ी को इस बात से अवगत कराना है कि बन्धुत्व हमारे संविधान का अभिन्न अंग है। अतएव उन्हें इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि वह देश में भाईचारे की भावना को कोई ठेस पहुँचायें। शिक्षा द्वारा हमारी चेष्टा होनी चाहिए कि एक कल्याणकारी राज्य का निर्माण हो जिसमें अधिकतम व्यक्ति अधिकतम प्रगति कर सकें।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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