भारतीय संविधान में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्वों (सिद्धान्तों) की विवेचना कीजिए।

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डॉ. अम्बेडकर के अनुसार, “राज्य-नीति के निदेशक तत्व भारतीय संविधान की एक अनोखी और महत्वपूर्ण विशेषता है।” यह विशेषता केवल आयरलैण्ड के संविधान में ही पायी जाती है। भारतीय संविधान के चौथे भाग में अनुच्छेद 36 से लेकर 51 तक में नीति निदेशक तत्वों का समावेश है। ये तत्व राज्य द्वारा नीति बनाने के लिए मार्गदर्शक माने गये हैं।

संविधान निर्माता, भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाना चाहते थे, परन्तु कल्याणकारी राज्य की स्थापना एक ही रात में नहीं हो सकती। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संविधान निर्माताओं ने नीति निदेशक तत्वों के रूप में कुछ ‘आदर्श’ राज्य के सामने रखे जिन्हें वह धीरे-धीरे क्रियान्वित करता जाए। इस आधार पर कहा जा सकता है कि नीति निदेशक तत्व संविधान में अनावश्यक रूप से नहीं रखे गए हैं।

राज्य के यह नीति निदेशक तत्व जिनका पालन करने से भारत को सच्चे कल्याणकारी राज्य बनाने की कामना की गई है, राज्य इनके लिए बाध्य नहीं है, इनका पालन करना आवश्यक नहीं है। राज्य इनकी उपेक्षा भी कर सकता है और विरोध भी, क्योंकि न्यायायल इन तत्वों को क्रियान्वित नहीं कर सकता। संविधान में अनुच्छेद 37 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “इस भाग के लिए किये गये उपबन्ध न्यायपालिका द्वारा क्रियान्वित नहीं किये जा सकते।” इसीलिए तो प्रो. के. टी. शाह ने चुटकी लेते हुए कहा था, “वह एक ऐसा चेक है, जिसका भुगतान बैंक की सुविधा पर छोड़ दिया गया है।” इस प्रकार कहा जा सकता है कि नीति निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए राज्य बाध्यकारी नहीं है, लेकिन शासन को संविधान द्वारा यह साफ-साफ निर्देश दिया गया है कि इन तत्वों का पालन करना शासन का कर्त्तव्य है।

नीति निदेशक तत्वों का वर्गीकरण

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 38 से 51 तक में राज्य के नीति निदेशक तत्वों का वर्णन है। ये तेरह अनुच्छेद नवयुवकों को रोजगार देने और गोवध बन्द करने से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा तक की कामना करते हैं और राज्य के निर्देश देते हैं कि वह इनका पालन करें। डॉ. एम. पी. वर्मा ने इन नीति निदेशक तत्वों को तीन भागों में वर्गीकृत किया है- 1. समाजवादी सिद्धान्त, 2. गाँधीवादी

सिद्धान्त 3. बौद्धिक उदारवादी सिद्धान्त।

1. समाजवादी सिद्धान्त-वे नीति निदेशक तत्व जो एक शोषणयुक्त तथा परस्पर समानता पर आधारित समाज की स्थापना करते हैं, उन्हें समाजवादी नीति निदेशक तत्वों में वर्गीकृत किया गया है। संविधान में इन तत्वों का समावेश श्री नेहरू तथा उनके अन्य समाजवादी साथियों के आग्रह पर हुआ था। ऐसे तत्व निम्नलिखित है

(i) अनुच्छेद 38 में कहा गया है कि जनकल्याण के लिये राज्य सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करेगा तथा उसका विस्तार करेगा और इसके लिए राज्य जितनी प्रभावशीलता और क्षमता के साथ सम्भव हो, एक सामाजिक व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें न्याय, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं के भाग होंगे 44वें संशोधन के अनुसार राज्य आय की असमानता को कम करेगा तथा सामाजिक स्तर सुविधाओं और अवसरों की असमानता, केवल व्यक्तियों की ही नहीं वरन् समूहों की असमानता भी कम करने का प्रयास करेगा।

(ii) संविधान के अनुच्छेद 39 में कहा गया है कि राज्य अपनी नीति का संचालन प्रकार करेगा कि- (क) स्त्री और पुरुष, सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो (ख) राष्ट्रीय धन का स्वामित्व और नियन्त्रण इस प्रकार किया जाए, जिससे सामूहिक हित की अच्छी से अच्छी व्यवस्था हो सके। (ग) आर्थिक व्यवस्था, इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी केन्द्रीकरण न हो। (घ) पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन हो। (ङ) श्रमिक पुरुषों और स्त्रियों के स्वास्थ्य और शक्ति तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो। (च) बच्चों को सुविधाएँ दी जाएँगी कि उनका स्वतन्त्रता और स्वाभिमान के वातावरण में स्वस्थ विकास हो सके तथा बचपन और यौवन के शोषण से एवं नैतिक व भौतिक अभाव से रक्षा की जायेगी।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 39 (अ) जोड़ा गया है। इसमें सामान्य न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता का प्रावधान किया गया। इसमें कहा गया है कि राज्य इस बात की व्यवस्था करेगा कि कानूनी पद्धति के अवसर की समानता के अधिकार पर सबको न्याय मिले तथा उन लोगों के लिये जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, निःशुल्क कानूनी सहायता की व्यवस्था करेगा। (iii) अनुच्छेद 41 में कहा गया है कि राज्य काम पाने के शिक्षा पाने के तथा बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी आदि की दशाओं में सहायता पाने के अधिकार को क्रियान्वित करने का प्रयत्न करेगा। (iv) अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य काम की यथोचित और मनोवांछित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता की व्यवस्था करेगा। (v) अनुच्छेद 43 में कहा गया है कि राज्य कानून अथवा आर्थिक संगठन द्वारा ऐसी परिस्थिति पैदा करेगा जिससे कृषि-उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में श्रमिकों का कार्य तथा निर्वाह योग्य मजदूरी तथा उत्तम जीवन स्तर और अवकाश तथा सामाजिक व सांस्कृतिक सुअवसर प्राप्त हो ।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 43 (अ) जोड़ दिया गया है। इसमें श्रमिकों द्वारा उद्योगों के संचालन में भाग लेने की व्यवस्था की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि शासन इस बात को प्रोत्साहित करेगा कि उद्योगों के संचालन में श्रमिकों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाये। (vi) अनुच्छेद 44 के अनुसार राज्य ऐसा प्रयास करेगा कि भारत के सभी व्यक्तियों के लिए एक समान आचार संहिता बनाई जाए।

निःसंदेह इन नीति-निदेशक तत्वों के क्रियान्वयन से समाजवादी समाज की स्थापना होगी, शोषण समाप्त होगा और समाज में समानता और प्रसन्नता की वृद्धि होगी।

न्यायमूर्ति हेगड़े के अनुसार, “संविधान का अनुच्छेद-38 निदेशक सिद्धान्तों की नींव का पत्थर है। यह अनुच्छेद राज्य के लिए यह आशय का निर्देश है कि वह लोगों के कल्याण के संवर्द्धन के लिए उपयुक्त सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए हमारे संविधान की प्रस्तावना में अभिव्यक्त आशाओं को मूर्त रूप प्रदान करे।”

2. गांधीवादी सिद्धान्त राष्ट्रीय आन्दोलन में गांधीजी का योगदान सबसे अधिक रहा है। •गाँधीजी ने पिछड़ी हुई जाति और वर्गों को उठाने में अस्पृश्यता समाप्त करने में, कुटीर उद्योगों का प्रसार करने में तथा श्रमिकों के जीवन को स्वच्छ बनाने में अथक परिश्रम किया था। गांधीजी की एक विशिष्ट चिन्तन शैली थी। संविधान के ये नीति निदेशक तत्व जिन पर गांधीजी का चिन्तन शैली का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है, वे इस प्रकार हैं-(i) अनुच्छेद 40 के अनुसार, राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करेगा और उन्हें स्वायत्त शासन की शक्तियाँ देगा। (ii) अनुच्छेद 43 में में कहा गया कि राज्य गाँव में कुटीर उद्योग की स्थापना को प्रोत्साहित करेगा। (iii) अनुच्छेद 46 के अनुसार, राज्य समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से हरिजनों तथा अनुसूचित जातियों की शिक्षा और आर्थिक विकास पर विशेष बल देगा। (iv) अनुच्छेद 47 के अनुसार, राज्य ऐसा प्रयास करे कि लोगों का आहार पौष्टिक तथा जीवन स्तर ऊँचा हो उस उद्देश्य से राज्य हानिकारक मादक पेयों तथा मादक वस्तुओं के सेवन पर प्रतिबन्ध लगायेगा और ऐसी व्यवस्था करेगा कि इन मादक वस्तुओं का सेवन केवल चिकित्सा के उपयोग में हो। (v) अनुच्छेद 48 के अनुसार, राज्य कृषि एवं पशुपालन का वैज्ञानिक ढंग से संचालन करेगा, गोवंश की रक्षा करेगा, विशेषकर बछड़ों, दूध देने वाले तथा भारवाही पशुओं की रक्षा करेगा और वध को बन्द करेगा (गोवध बन्द करायेगा)। इन सिद्धान्तों के क्रियान्वयन से निश्चित ही एक गांधीवादी समाज की स्थापना को बल मिलता है।

3. उदारवादी सिद्धान्त-भारतीय समाज को स्वस्थ और प्रसन्न बनाने के लिए कुछ उदारवादी तत्वों का भी समावेश किया गया है, वे इस प्रकार हैं-(i) अनुच्छेद 45 के अनुसार, चौदह वर्ष तक के सभी बच्चों को राज्य की ओर से अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था राज्य करेगा। (ii) अनुच्छेद 48 के अनुसार, राज्य कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में वैधानिक पद्धति को प्रोत्साहित करेगा।

42वें संशोधन द्वारा संविधान में अनुच्छेद 48(अ) जोड़ दिया गया है। इसके अनुसार राज्य पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने का प्रयास करेगा और देश के वर्षों तथा वन्य पशुओं की रक्षा का प्रयास करेगा। (iii) अनुच्छेद 49 में कहा गया है कि राज्य का यह कर्त्तव्य होगा कि वह प्रत्येक कलात्मक, ऐतिहासिक इमारत अथवा वस्तु की रक्षा करे जो राष्ट्र के लिये महत्त्वपूर्ण हो तथा वह नष्ट होने से, टूटने-फूटने से एवं उसके हटने या लुप्त होने से उसकी रक्षा करेगा। (iv) अनुच्छेद 50 में कहा गया है

कि राज्य यह प्रयत्न करेगा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् किया जाए। (v) अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के लिए कुछ सिद्धान्त सुझाये गये हैं। इनमें कहा गया है कि अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में राज्य को ये प्रयत्न करने चाहिए-(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा के प्रयत्न (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखने के प्रयत्न (ग) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के प्रयत्न राज्य के ये नीति निदेशक तत्व उदारवादी कहे जा सकते हैं।

नीति निदेशक तत्वों का मूल्यांकन तथा महत्व-

1. नीति निदेशक तत्व अनावश्यक हैं-संविधान में तो यह साफ-साफ कहा गया है कि नीति निदेशक तत्वों को न्यायालय की मान्यता प्राप्त नहीं है। न्यायपालिका उसका पालन नहीं करवा सकती। आलोचकों का मत है, ऐसी अवस्था में राज्य के नीति निदेशक तत्व अनावश्यक और निरर्थक बन जाते हैं। उनका उपयोग ही क्या है, ये केवल “शुभ इच्छाएँ” और “नैतिक उपदेश” हैं। इनका उचित स्थान संविधान में नहीं है।

2. प्रगति विरोधी प्रो. जैनिंग्स ने इन नीति निदेशक तत्वों को प्रगति विरोधी कहा है। यह सिद्धान्त एक समय विशेष में बनाये गये हैं। हो सकता है पचास वर्षों के पश्चात् ये एकदम पुराने और असामयिक प्रतीत हों। नई परिस्थितियों, नये संदर्भों और नई आवश्यकताओं के वह प्रतिकूल सिद्ध हों। उस समय ये नीति निदेशक तत्व एकदम प्रतिगामी प्रतीत होंगे।

3. तारतम्य का अभाव-ऐसा प्रतीत होता है कि संविधान का निर्माण करते हुए भारत के भविष्य की कल्पना करते हुए संविधान निर्माताओं के मन में जो भी शुभ विचार आये, वे उन्हें राज्य के नीति निदेशक तत्वों में रख दिये। इन शुभ इच्छाओं में कोई परस्पर तारतम्य नहीं है। गाँव में पंचायत की स्थापना से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में शान्ति की कामना ये तत्व करते हैं। एक ओर अत्याधुनिक सिद्धान्त है तो दूसरी ओर एकदम परम्परागत प्रो. श्रीनिवासन के अनुसार, “इनमें नये और पुराने तत्वों का बेतुका मिश्रण तथा विवेकपूर्ण एवं भावुकतापूर्ण तत्वों का मिश्रण है।”

4. संवैधानिक अन्तर्विरोध-नीति निदेशक तत्वों के कारण संविधान के पालन के सम्बन्ध में अन्तर्विरोध उत्पन्न हो सकता है। यदि निदेशक तत्व और मौलिक अधिकार में विरोध हो तो न्यायपालिका के लिए एक असमंजस्य की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उदाहरणार्य भारत का संविधान सभी व्यक्तियों को नागरिक स्वतन्त्रता भी प्रदान करता है, साथ ही नीति निदेशक तत्व यह भी कहते हैं कि भारत में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक जैसे कानून बनाये जाएँ। दोनों बातों में विरोधाभास है।

5. अव्यावहारिक-राज्य के नीति निदेशक तत्व एक दृष्टि से अव्यावहारिक हैं। भारत को एक प्रजातान्त्रिक देश बनाया गया है। इसमें कभी एक दल का शासन होगा, तो कभी दूसरे का एक ही समाज के बारे में एक की कल्पना अलग होगी, दूसरे की अलग। वे अलग-अलग मार्गों से निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहेंगे। नीति निदेशक तत्व उनके लिए अव्यावहारिक बंधन ही होंगे। राज्य के नीति निदेशक तत्वों की उपर्युक्त आलोचना काफी प्रभावशाली है, तो भी आलोचकों के कई तर्कों का खण्डन किया जाता है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है कि संविधान में नीति निदेशक तत्वों के समावेश का पर्याप्त औचित्य है।

डॉ. ओम नागपाल के शब्दों में, “नीति निदेशक तत्वों का कानूनी रूप से क्रियान्वयन न हो तो भी किसी शासन के लिए इन नीति निदेशक तत्वों की उपेक्षा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि इनके पीछे जनमत की अनुशस्ति है।”

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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