जलवायु परिवर्तन के कारणों एवं प्रभावों की विवेचना कीजिए।

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वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का तापमान बढ़ने से विश्वभर में जलवायु का मिजाज बदल रहा है। ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एण्ड डेवलपमेण्ट’ नामक एजेन्सी के अनुसार जलवायु की बदलती प्रकृति से विश्वभर में प्रतिवर्ष 970 अरब रुपये की हानि हो रही है। प्राकृतिक वातावरण में लगातार परिवर्तन होने से पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की 50 से 80 प्रतिशत प्रजातियाँ नष्ट हो चुकी हैं। प्रमुख रूप से भारत, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका में इसका दुष्प्रभाव भारी वर्षा या वनों के समाप्त होने के रूप में पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार समुद्र क्षेत्र में तापमान में वृद्धि होने से हिन्द महासागर में प्रवाल भित्ति (मूँगे की चट्टानें) नष्ट हो गई है। विश्व परिदृश्य में बदलाव का असर मौसम पर सर्वाधिक देखा जा सकता है। वर्ष 1980 से अरब तक 22 वर्षों में गर्मी ज्यादा रही और पिछले 20 वर्ष में तूफान, ओलावृष्टि और बाढ़ आने का क्रम तेजी से बढ़ा है, बारिश की आवृत्ति भी ज्यादा रही है।

19 दिसम्बर, 2000 को जारी विश्व मौसम संगठन की विश्व मौसम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 विगत 140 वर्षों में सर्वाधिक गर्म रहा। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 का तापमान सन् 1961 से वर्ष 1990 तक के औसत तापमान की तुलना में 0.32° अधिक रहा है। ज्ञातव्य है कि इस संगठन के द्वारा विश्व मौसम के सम्बन्ध में आँकड़ों का संग्रहण गत 140 वर्षों से ही किया जा रहा है।

विश्व मौसम संगठन (W.M.O.) एवं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा प्रायोजित एवं विश्व के सौ राष्ट्रों के वैज्ञानिकों के ‘इण्टर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेन्ज’ (IPCC) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 21वीं शताब्दी के अन्त तक विश्व के औसत तापमान में 1.4°C से 5.8°C तक की वृद्धि हो सकती है। 22 जनवरी, 2001 को शंघाई में जारी इस रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल तापमान में इस वृद्धि के कारण सन् 2100 इस समुद्र तल में 88.5 सेमी तक की वृद्धि हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 का दशक पिछले एक हजार वर्षों में सबसे गर्म दशक रहा है।

दूसरी ओर सन् 2000 में वर्ल्ड वाच (World Watch) नामक पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, रॉकीट एंडीज, आल्पस और हिमालय पर्वतों से बर्फ तेजी से पिघल रही है। इसका कारण पृथ्वी पर तापमान का बढ़ना रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछला डेढ़ दशक पृथ्वी के लिए सर्वाधिक गर्म रहा है और इस दौरान वायुमण्डल में कार्बन की मात्रा में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। पहाड़ों पर बर्फ के साथ प्रशांत महासागर में आइस कैप (Ice Cap) भी संकुचित होते जा रहे हैं। 35 वर्ष में आइस कैंप का 40 प्रतिशत भाग संकुचित होकर पानी बन गया है।

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला पहलू है-समुद्र के किनारे बसे हुए शहरों के डूबने का खतरा। बताया गया है कि तापमान बढ़ने के कारण आइस कैप का संकुचित होना यदि इसी तरह जारी रहा तो आने वाले वर्षों में समुद्र के किनारे बसे द्वीप अपना अस्तित्व खो देंगे, क्योंकि समुद्र अपना आकार बढ़ाकर द्वीपों को अपने में समाहित कर लेगा। वर्षों पहले ही कई द्वीप लगभग लुप्त हो चुके हैं। समुद्र का आकार बढ़ने का खतरा इसके किनारे बसे शहरों को है। पर्यावरण की एक अन्य पत्रिका ‘इकोलॉजी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, हर वर्ष अरब सागर में 3,300 क्यूबिक किलोमीटर पानी आता है।

इकोलॉजी (Ecology) रिपोर्ट के अनुसार, एशिया पर खतरा पिछले वर्ष में बढ़ा है। भारत में लू से सर्वाधिक मौतें, इण्डोनेशिया में जंगलों में आग, चीन में बाढ़ की व्यापक विभीषिका और मलेशिया में कोको और रबर की फसल की तबाही से इसका संकेत मिलता है।

उपर्युक्त रिपोर्टों के अनुसार,

1. पृथ्वी का तापमान बढ़ने और प्राकृतिक असन्तुलन के कारण विशाल हिमखण्ड पिघल जायेंगे और सागर तल में लगभग 100 मीटर की वृद्धि हो जायेगी। ऐसी • स्थिति में भू-पटल का भयंकर विनाश तथा उथल-पुथल होने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वर्तमान गति से प्रदूषण बढ़ता गया तो उपरोक्त सम्भावित स्थिति मानव समाज इस पृथ्वी पर सन् 2100 तक ले आयेगा।

2. ग्रीन हाउस जन्य जलवायु परिवर्तन से पृथ्वी के कुछ भागों पर भयंकर सूखा पड़ेगा, तो अन्य भू-भागों पर भयंकर बाढ़ें आयेंगी। दोनों ही स्थितियों में अकाल तथा महामारी जैसे प्राकृतिक प्रकोपों के सक्रिय होने की पूरी सम्भावना है। साथ ही भूमण्डलीय तापमानों के बढ़ने से धूल भरी आँधियाँ, वनों का विनाश तथा वनों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ेंगी, साथ ही कई नगर व ग्रामीण क्षेत्र अधिक गर्म हो जाने के कारण मानव-निवास के योग्य नहीं रहेंगे।

3. पृथ्वी के औसत तापमानों में जैसे-जैसे वृद्धि होती जायेगी, वाष्पीकरण क्रिया तीव्र होते जाने से भू-पटल से पीने के पानी की मात्रा में क्रमशः कमी आती जायेगी। मानवीय जीवन के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण जल की मात्रा में कमी होने से मानव जाति का अस्तित्व ही संकट में पड़ जायेगा। 4. पृथ्वी के औसत तापमानों में वृद्धि होने के फलस्वरूप उत्पन्न मौसमीय बदलाव का सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। पृथ्वी पर वर्तमान में महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र रेगिस्तानी भागों में परिवर्तित हो जायेंगे।

5. ग्रीन हाउस प्रभाव से मानव के शरीर में अनेक शारीरिक विकार उत्पन्न होंगे।

6. आस्ट्रेलिया के इण्टरनेशनल इन्स्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम एनालाइसिस (ILASA) के डिप्टी डायरेक्टर बो दूस के अनुसार, ग्रीन हाउस प्रभाव को रोकने के लिए जब तक कुछ नहीं किया

जाता, सन् 1990 से 2020 तक प्रतिदिन लगभग 50 पादप व जन्तु प्रजातियाँ विलुप्त होती रहेंगी। दिन-प्रतिदिन दुनिया भर के तापमान में वृद्धि होने के कारण अन्टार्कटिका के जीवों पर खतरे का बादल मंडरा रहा है। अगर तापमान में इसी तरह वृद्धि होती रही, तो बहुत से समुद्री जीव अगली • शताब्दी तक विलुप्त हो जायेंगे। इनमें सी स्पाइडर और अन्टार्कटिका क्रिल शामिल हैं।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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