पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा प्रवाह की क्रिया एवं नियमों का वर्णन कीजिए।

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एक पारिस्थितिक तंत्र को सभी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। सूर्य की ऊर्जा का केवल एक प्रतिशत ही हरे पौधे प्रकाश-संश्लेषण द्वारा संचय करते हैं। प्रकाश ऊर्जा की यह छोटी-सी मात्रा संसार में समस्त जीवित प्राणियों के लिए उपयुक्त होती है।

उर्जा प्रवाह के नियम-पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवेश, रूपान्तरण तथा विसरण ऊष्मागति के नियमों (laws of thermodynamics) के अनुसार होता है, जो निम्नलिखित है (1) ऊर्जा का निर्माण व नाश नहीं होता, इसका रूपान्तरण होता है।

(2) ऊर्जा के रूपान्तरण की क्रिया में कुछ ऊर्जा परिवर्तित रूप में तंत्र से परिक्षेपित अवस्था में विसरित होती है। सृष्टि में ऊर्जा के अनेक रूपों, जैसे—विद्युत, रासायनिक, यान्त्रिक, प्रकाश के निम्न कोटिकरण से अन्त में ताप के रूप ऊर्जा वातावरण में विसरित होती है

किसी भी पारिस्थितिक तंत्र में स्वयंपोषी पौधे जितनी ऊर्जा खाद्य रूप में संचित करते हैं वह सभी शाकाहारी जीवों को खाद्य से प्राप्त होती हैं। शाकाहारी जीव प्राथमिक उपभोक्ता होते हैं, परन्तु शाकाहारी जीव इस ऊर्जा का केवल 10 प्रतिशत भाग अपने शारीरिक भाग में संचय करते हैं और शेष 90 प्रतिशत उनकी जैविक क्रियाओं में प्रयोग हो जाता है तथा मलमूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। इसी प्रकार से शाकाहारी जीव मांसाहारी जीवों द्वारा खा लिये जाते हैं, जैसे कि शेर हिरन को खा जाता है और इस प्रकार से ऊर्जा फिर कम हो जाती है।

प्रत्येक प्रकार के पारिस्थितिक तन्त्र में हरे पौधे ही ऐसे जीव होते हैं जो कि प्रकाश ऊर्जा या सौर ऊर्जा को खाद्य-ऊर्जा अथवा रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं सौर ऊर्जा का मुख्य स्रोत सूर्य है। इसी ऊर्जा के प्रभाव से सभी पारिस्थितिक तन्त्र चलते रहते हैं। पारिस्थितिक तन्त्र में जब ऊर्जा एक पोषण स्तर से दूसरे पोषण स्तर तक स्थानान्तरित होती है, तो इसमें से केवल 10% ऊर्जा ही स्थानान्तरित हो पाती है, शेष ऊर्जा विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में व्यय हो जाती है। कुछ ऊर्जा ताप के रूप में नष्ट हो जाती है। पौधे सौर ऊर्जा का केवल 0.2% भाग ही प्रकाश-संश्लेषण क्रिया द्वारा खाद्य पदार्थों के निर्माण में उपयोग कर पाते हैं। पौधे इस ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित रखते हैं।

युक्त पौधे प्रत्येक प्रकार के पारिस्थितिक तन्त्र के मूल उत्पादक होते हैं। ये सौर क्लोरोफिल ऊर्जा का 0.2% भाग ही उपयोग कर पाते हैं। उत्पादकों से इस ऊर्जा का केवल 10% भाग ही प्रथम श्रेणी के उपभोक्ताओं तक पहुँच पाता है, शेष 90% भाग नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार अन्य पोषण स्तरों में भी ऊर्जा का केवल 10% भाग ही स्थानान्तरित हो पाता है। इसे दस प्रतिशत नियम (10%) law) कहते हैं। इस प्रकार ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एक दिशीय ही होता है। पेड़-पौधे एवं अन्य जन्तुओं की मृत्यु के पश्चात सूक्ष्म जीवों के द्वारा उनका अपघटन होता है और शेष ऊर्जा जीवाणुओं एवं कवकों के द्वारा उपयोग कर ली जाती है। इस प्रकार सूर्य से प्राप्त सौर ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में सम्पूर्ण पारिस्थितिक तन्त्र में उतरोत्तर पोषण तलों द्वारा उपयोग कर ली जाती है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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