मृदा प्रदूषण के कारकों एवं उपायों की विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

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मिट्टी के प्राकृतिक गुणों में मानव द्वारा किया गया ऐसा कोई परिवर्तन जो मानव एवं अन्य जीवधारियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, मृदा प्रदूषण कहलाता है।

मिट्टी प्रदूषण में बाह्य स्रोतों से मिट्टी में कुछ ऐसे पदार्थ मानव द्वारा मिला दिये जाते हैं या कभी-कभी स्वयं भी मिल जाते हैं, जो मानव एवं अन्य जीवधारियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। यही नहीं, प्रदूषित मिट्टी स्थलीय जैव श्रृंखला को भी प्रभावित करती है। अतः मिट्टी पर किया गया कोई भी आक्रमण वास्तव में समस्त जैव अस्तित्व पर आक्रमण होता है। वर्तमान समय में लाखों टन विषैले अपशिष्ट पदार्थ मिट्टी में मिलकर उसे प्रदूषित कर रहे हैं जो सम्पूर्ण विश्व के लिये एक भारी त्रासदी बनती जा रही है। वस्तुतः मृदा प्रदूषण की समस्या ठोस अपशिष्ट पदार्थों के निपटान की समस्या का दूसरा नाम है।

अतः अपशिष्ट पदार्थों का समुचित निपटान न होने पर भी मृदा प्रदूषण होता है।

मृदा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Main Sources of Soil Pollution )

मृदा को प्रदूषित करने वाले प्रमुख स्रोत निम्नानुसार है

( 1 ) घरेलू एवं औद्योगिक कूड़ा-करकट एवं अपशिष्ट (2) उर्वरक तथा कीटनाशक व खरपतवारनाशक पदार्थ ।

(3) औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ जब मिट्टी में छोड़ दिये जाते हैं तब मृदा प्रदूषण होता है।

(4) अम्लीय जल वर्षा तथा खानों से प्राप्त जल, मृदा के मुख्य प्रदूषक हैं।

(5) भारी धातुएँ; जैसे- कैडमियम, जिंक, निकिल, आर्सेनिक आदि खानों से मृदा में मिल जाते हैं। वे धातुएँ पौधों के लिए हानिकारक तो हैं ही, साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए भी हानिकारक होती है।

(6) अस्थियाँ, कागज, ड्रा-गला माँस, सड़ा हुआ भोजन, लोहा, लैड, ताँबा, पारा आदि भी मृदा को प्रदूषित करते हैं।

(7) हमारे गाँवों में असंख्य स्त्री पुरुष तथा बच्चे खेतों में ही मल विसर्जित करते हैं, जिससे मृदा प्रदूषित हो जाती है।

(8) कीटनाशक; जैसे-डी. डी. टी. (D.D.T.) अधिक हानिकारक पदार्थ है। उत्पादक से उपभोक्ता के शरीर में पहुँचने पर इनकी सान्द्रता बढ़ जाती है।

(9) मृदा की लवणता, अधिक फसलें उगाने तथा जल का पूर्ण प्रवाह न होने से अत्यधिक बढ़ जाती है। ग्रीष्म ऋतु में, लवण प्रायः निचले स्तरों से ऊपरी सतहों से कैपिलरी क्रिया द्वारा आते हैं।

इससे मृदा की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मृदा प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Effects of Soil Pollution )

(1) घरेलू अपशिष्ट-विभिन्न घरेलू व्यर्थ पदार्थों तथा शौच को भूमि पर पड़ा रहने देने से मक्खियों, मच्छरों, चूहों तथा अन्य रोगवाहक जीवों की जनसंख्या में वृद्धि होती है जो मानवीय स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

(2) नगरपालिका अपशिष्ट नगरपालिका अपशिष्टों में पैकिंग अपशिष्ट, पॉलिथीन, प्लास्टिक, घरेलू कचरा आदि सम्मिलित होता है। यह कूड़ा-कचरा जिस स्थान पर डाला जाता है, वह वहाँ की मिट्टी को ही प्रदूषित नहीं करता, वरन् उस स्थान का भूगर्भिक जल भी इससे प्रदूषित हो जाता है। चूँकि इन्हें आसानी से नष्ट नहीं किया जा सकता, अतः पॉलिथीन मिश्रित कूड़ा-करकट मिट्टी को प्रदूषित कर सार्वजनिक स्वच्छता के लिए अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है।

(3) औद्योगिक अपशिष्ट अधिकांश उद्योगों में कार्यरत भट्टियों से एक काले-भूरे रंग का अधजला पदार्थ निकलता है, जिसे फ्लाई एश कहा जाता है। फ्लाई एश मृदा को प्रदूषित करने वाला एक प्रमुख प्रदूषक है। उद्योगों से प्राप्त व्यर्थ पदार्थों की कुछ मात्रा जल में घुलकर मिट्टी में पहुँच जाती है तथा मिट्टी को प्रदूषित कर देती है। औद्योगिक अपशिष्टों का सामान्यतया समुचित निपटान किये बिना भूमि पर यत्र-तत्र फेंक दिया जाता है जिससे प्रभावित भूमि प्रदूषित हो जाती है, जिससे लाखों लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

(4) कृषि अपशिष्ट-वर्तमान में प्रति हेक्टेअर कृषि भूमि में रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशक व फंगसनाशक रसायनों की खपत में वृद्धि होने लगी है, जिससे भूमि में रासायनिक अवयवों का जमाव बढ़ता जाता है तथा मिट्टी प्रदूषित हो जाती है। कुछ कीटनाशक रसायनों का फसलों पर छिड़काव विभिन्न रोगों से सुरक्षा हेतु किया जाता है। इन रसायनों में डी. डी. टी., लिण्डेन, वी. एस. सी., एल्डरीन तथा डाइल्डरीन का छिड़काव सर्वप्रमुख है। जब यह रसायन फसलों पर छिड़के जाते हैं तो उनका कुछ भाग मिट्टी में मिलकर उसे प्रदूषित कर देता है। इस प्रदूषित मिट्टी पर उगने वाली वनस्पति में भी इन कीटनाशक रसायनों के अंश प्रवेश कर जाते हैं तथा जब इन वनस्पति के उत्पादों का उपयोग मानव द्वारा किया जाता है तो इन रसायनों की कुछ मात्रा मानवीय शरीर में पहुँचकर उसके • स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

(5) अन्य स्रोत–(i) प्रदूषित जल द्वारा कृषि फसलों में सिंचाई करने से प्रदूषित तत्व मिट्टी में प्रवेश कर उसे प्रदूषित कर देते हैं, जिससे कृषि फसलों के उत्पादों में उस प्रदूषित तत्व के कुछ अंश पहुँचकर कृषि उत्पाद को प्रदूषित कर देते हैं।

(ii) परमाणु विस्फोटों से रेडियोधर्मी पदार्थ भूमि पर जहाँ भी गिरते हैं, उन क्षेत्रों की मिट्टी प्रदूषित हो जाती है।

(iii) अम्लीय वर्षा से प्रभावित क्षेत्र की मिट्टी अम्लीय पदार्थों के मिश्रण से प्रदूषित हो जाती है। (iv) खनन क्षेत्रों में खानों से निष्कासित मिट्टी के कण समीपवर्ती कृषि भूमि पर गिरकर उसमें मिल जाते हैं जिससे मिट्टी की उर्वरता पर दुष्प्रभाव पड़ता है। (v) नाभिकीय विस्फोटों पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिबन्ध लगाकर मिट्टी को रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाया जा सकता है।

(vi) पॉलिथीन के प्रयोग पर प्रभावी ढंग से प्रतिबन्ध लगा दिया जाए।

मृदा प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपाय (Measures to Control Soil Pollution)

मृदा प्रदूषण पर नियन्त्रण के उपाय निम्नलिखित हैं (1) मानवीय बस्तियों से प्राप्त कूड़े-कचरे व मल-मूत्र के निपटान की समुचित व्यवस्था की जाए।

(2) व्यर्थ कागज एवं कपड़ों का संग्रह कर कागज की लुग्दी बनाई जा सकती है। व्यर्थ काँच, व्यर्थ प्लास्टिक, व्यर्थ लौह एवं टिन आदि की पुनर्चक्रीय प्रक्रिया द्वारा उपयोगी स्वरूपों में परिवर्तित किया जा सकता है, साथ ही मिट्टी को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सकता है।

(3) मानवीय बस्तियों में बड़े-बड़े कूड़ेदान ऐसे समुचित स्थानों पर स्थापित किये जाएँ, जहाँ कि उनका उपयोग अधिकतम लोगों द्वारा आसानी से किया जा सके।

मृदा प्रदूषण का नियन्त्रण (Control of Soil Pollution )

(4) कीटों से फसलों की रक्षा करने के लिए कीटनाशक पदार्थों के स्थान पर जैविक नियन्त्रण विधि को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस दिशा में हानिकारक कीटों की एक्स-रे विकिरण द्वारा बंध्याकरण की विधि बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। पीड़क व कीटों के नियन्त्रण की एक एक और विधि यह है कि खेतों व फलोद्यानों में इनके प्राकृतिक शत्रुओं को फलने-फूलने दिया जाता है जिससे कुछ ही समय में इनसे मुक्ति मिल जाती है।

(5) घरों में साग-सब्जी व फलों का प्रयोग करने से पहले इन्हें धो लेना चाहिए। इस प्रकार D.D.T. व अन्य पदार्थों के प्रभाव से बचा जा सकता है।

(6) मृदा के अपरदन को रोकने के लिए घास तथा छोटे पौधे लगाने चाहिए। (7) ठोस पदार्थ, जैसे–टिन, ताँबा, लोहा, काँच आदि को मृदा में नहीं दबाना चाहिए। ठोस पदार्थों को गलाकर या चक्रीकरण द्वारा पुनः उपयोग में लाया जाना चाहिए।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

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