जल संरक्षण को संक्षेप में समझाइए।

0
182

जल एक नवीनीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है, जिसकी उपलब्धता प्रयोग के साथ समाप्त नहीं होती, वरन् जलीय चक्र के माध्यम से पृथ्वी पर जल की उपलब्धता सतत् रूप से कायम रहती है। वर्तमान में मानव-उपयोग से स्वच्छ जल के समस्त ज्ञात भण्डारों का अनुमानित आयतन 20 मिलियन घनमीटर है, जो मानव की वर्तमान जल उपभोग दर के अनुसार अधिकतम 20 अरब व्यक्तियों की जल आवश्यकताओं की आपूर्ति की क्षमता रखता है। यदि विश्व की जनसंख्या की वर्तमान वृद्धि दर भविष्य में कायम रहती है, तो 21 वीं शताब्दी में ही विश्व की जनसंख्या 20 अरब तक पहुँच जायेगी। दूसरी ओर समुद्र तल निरीक्षण के विश्लेषण यह प्रदर्शित करते हैं कि पिछले लगभग 60 से 80 वर्षों में सागर की सतह में 1.2 मिमी. प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हो रही है। सागरीय भागों की प्रतिवर्ष बढ़ रही इस सतह का अर्थ है कि पृथ्वी के भू-भागों में प्रतिवर्ष जल का लगभग 430 घन किमी. आयतन कम हो रहा है। उपर्युक्त तथ्य पृथ्वी के भू-भागों पर जलीय संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता को बताने के लिए पर्याप्त है। वस्तुतः वह दिन अब दूर नहीं जब पृथ्वी के अधिकांश निवासियों के लिए जल की कमी अनुभव होने लगेगी और विश्व के प्रत्येक राष्ट्र का प्रशासन जल संरक्षण कार्यक्रमों को प्राथमिकता से कार्यान्वित करेगा।

जल संरक्षण की आवश्यकता (Need for Water Conservation)

आज लोगों को एक-एक घड़े शुद्ध पेयजल के लिये मीलों भटकना पड़ रहा है। जल के टैंकर और ट्रेन से जल प्राप्त करने के लिए घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है। रोजमर्रा के कामकाज नहाने, कपड़े धोने, खाना बनाने, बर्तन साफ करने, उद्योग धंधा चलाने के लिये तो जल चाहिए वह कहाँ से लाए। जबकि नदी, तालाब, ट्यूबवैल, हैण्डपम्प एवं कुएँ बावड़ियाँ सूख गए हैं। पशु-पक्षियों को भी पानी के लिये मीलों भटकना पड़ता है। पेड़-पौधे भी सूखते जा रहे हैं। जल की कमी से अनेक कारखाने बंद होने से लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। खेती-बाड़ी के लिये तो और भी अधिक पानी की जरूरत है परन्तु पानी नहीं मिलने से खेती-बाड़ी चौपट होती जा रही है। जल संकट हमारे पूरे दैनिक जीवन को बुरी तरह से प्रभावित करता है। इसलिये इस मसले पर प्राथमिकता से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

जल संरक्षण एवं प्रबन्धन की विधियाँ (Water Conservation and Management Method)

(1) वर्षाजन्य जलप्रवाह को नियन्त्रित तथा संगृहीत करना- जिस अवधि में वर्षा अधिक होती है, उस समय अधिकांश जल व्यर्थ में बहकर नदियों के माध्यम से महासागरों में पहुँच जाता है। अतः वर्षाकाल में नदियों के जल प्रवाह को बड़े-बड़े बाँध निर्मित कर नियन्त्रित किया जा सकता है तथा

बाँधों के पीछे वृहद् जलाशय निर्मित कर काफी मात्रा में जल संगृहीत किया जा सकता है। वर्षाकाल में संग्रहीत जल का उपयोग शुष्क काल में नहरों के माध्यम से किया जा सकता है। जलाशयों के निर्माण से बाढ़ों के प्रकोप को भी काफी सीमा तक कम किया जा सकता है।

भारत के झारखण्ड राज्य में वर्षा जल प्रवाह को ‘आहर पड़न’ प्रणाली से संरक्षित किया जाता है। इस प्रणाली में ढालू जमीन से प्रवाहित होने वाले जल को सिंचित करने की लिये बाँधनुमा आयताकार तालाब निर्मित किये गये हैं, जिन्हें ‘आहर’ नाम से जाना जाता है। इसके अलावा पहाड़ी नदियों के जल को समीपवर्ती खेतों तक पहुँचाने के लिए छोटी-छोटी नहरें निर्मित की गयी है। इस प्रणाली को ‘पइन’ कहा जाता है। वर्षाकाल में बाढ़ के अतिरिक्त जल के संरक्षण की आहर पहन प्रणाली झारखण्ड राज्य में उन्नत जल प्रबन्ध का विलक्षण उदाहरण है। तमिलनाडु तथा कर्नाटक राज्यों में जल की कमी को ध्यान में रखते हुए तालाबों का जाल बिछाया गया है। ये तालाब के जल को संगृहीत कर उस इलाके में कृषि तथा पेयजल का टिकाऊ आधार प्रदान करते हैं। मालाबार के कासरगोड़ जनपद के पहाड़ी क्षेत्रों में भुरभुरी चट्टानें मिलती हैं। इन भुरभुरी चट्टानों पर होने वाली वर्षा का जल ‘सुरंगों’ द्वारा निचले इलाकों में निर्मित कुओं में पहुँचाया जाता है।

(2) वृक्षारोपण–जल संरक्षण में वृक्षों एवं घास की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सघन वनस्पति वाले क्षेत्रों में वर्षा का जल भूमि पर सीधे न पड़कर पहले पेड़-पौधों की पत्तियों पर पड़ता है तथा फिर धीरे-धीरे भूमि पर पड़ता है। इस जल को भूमि अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में अवशोषण कर लेती है, जबकि यदि भूमि वनस्पतिरहित हो तो वर्षा का जल अपेक्षाकृत तेजी के साथ भूमि पर गिरकर शीघ्र ही आगे बढ़ जाता है। इससे भूमि कम मात्रा में जल का अवशोषण कर पाती है। अतः भूमि पर वृक्षों की जितनी अधिक उपस्थिति होती है, वर्षा का जल उतनी अधिक मात्रा में भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जायेगा तथा वहाँ भूमिगत जल की मात्रा में भी वृद्धि हो जायेगी। यही नहीं, जिन स्थानों पर सघन वनस्पति होती है, वहाँ मिट्टी की ऊपरी परत में जीवांश की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक मिलती है, जिससे मिट्टी की जल अवशोषण क्षमता में वृद्धि हो जाती है।

(3) भूमिगत जल की आपूर्ति एवं उपभोग में सन्तुलन कायम रखना-मानव द्वारा भूमिगत जल के अविवेकपूर्ण शोषण से विश्व के कई क्षेत्रों में भूमिगत जल का अभाव उत्पन्न हो गया है। जल की निरन्तर उपलब्धता बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि भूमिगत जल का उपभोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाये। किसी एक क्षेत्र में भूमिगत जल के निकलने के लिए प्रयुक्त किये जा रहे नलकूपों की संख्या सीमित होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो शीघ्र ही उस क्षेत्र में भूमिगत जल का अभाव उत्पन्न हो जाता है। यही नहीं, जिन क्षेत्रों में भूमिगत जल के उपभोग के वैज्ञानिक एवं विकसित तरीके प्रचलित नहीं हैं, वहाँ उन्हें प्रचलन में लाया जाये।

(4) जलीय स्रोतों की जल प्रदूषण से सुरक्षा-जिन नदियों, झीलों, तालाबों या जलधाराओं का जल मानव द्वारा प्रयोग किया जाता है, उस जल की प्रदूषण से सुरक्षा भी जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य है। इन जलीय स्रोतों में औद्योगिक अपशिष्टों, कूड़े-कचरे तथा मल व्यमन के डालने पर कानूनी प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए तथा समय-समय पर जलीय स्रोतों की सफाई भी आवश्यक है। जलाशय के प्रदूषित जल को जलकुम्भी तथा कुमुदनी पौधों के रोपण द्वारा काफी समय तक कम शुद्ध किया जा सकता है।

(5) अशुद्ध जल का शुद्धिकरण-जिन जलीय स्रोतों में अशुद्ध जल की उपलब्धता है, वहाँ के जल को नवीन वैज्ञानिकों विधियों द्वारा शुद्ध कर मानवीय उपयोग हेतु प्रयुक्त किया जाये। साथ ही सागर के नमकीन जल को पीने योग्य बनाने हेतु कम लागत वाली वैज्ञानिक विधियों के विकास पर बल दिया जाये।

(6) जल का सीमित प्रयोग मानव प्रतिदिन काफी जल व्यर्थ में ही बहा देता है। प्रत्येक व्यक्ति द्वारा जल संरक्षण के महत्व को समझना आवश्यक है। जल का सीमित मात्रा में सदुपयोग कर जल की उपलब्धता को कायम रखना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक कर्त्तव्य होना चाहिए।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here