बाढ़ के कारण

0
30

(1) वनस्पति विनाश (2) वर्षा की अनिश्चितता (3) नदी तल पर अधिक मलवे का जमाव, (4) नदी की धारा में परिवर्तन, (5) नदी मार्ग में मानव निर्मित व्यवधान (6) तटबन्ध और तटीय अधिवास हाल के वर्षों में बाढ़ का प्रकोप बढ़ा है जिसके दो कारण है। पहला यह कि बाढ़ की घटना

बढ़ोत्तरी पर है, क्योंकि वर्षा के कालिक और स्थानिक वितरण में मौसमी व्यतिक्रम बढ़ रहा है तथा दूसरा कारण बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जनसंख्या प्रसार है जिससे बाढ़ के प्रकोप का मूल्यांकन बढ़ गया है। वर्ष 1953 से 1975 के मध्य बाढ़ से होने वाली क्षति का अनुमान लगाया गया, जिसके अनुसार औसत 74 लाख हेक्टेयर भूमि प्रतिवर्ष प्रभावित होती है जिसमें से 31 लाख हेक्टेयर भूमि बोई गई होती है। औसतन 8 लाख मकान और 50 हजार पालतू पशुओं का नुकसान होता है। मरने वालों की औसत संख्या 742 ऑकी गई और फसल नुकसान 2 अरब से अधिक आँका गया। कभी-कभी एक साल में यह नुकसान9 अरब रुपया तक पहुँच जाता है। इस क्षतिपूर्ति के लिए सरकार को भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। उत्तर भारत की नदियाँ विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रतिवर्ष बाढ़ का ताण्डव करने लगी हैं। वर्षाकाल शुरू होते ही बाढ़ बचाव कार्य में प्रशासन जुट जाता है और वर्षाकाल समाप्त होते ही राहत की सांस लेता है। स्वतन्त्रता के बाद इससे निपटने के लिए भारत सरकार की योजनाएँ चलती रही हैं, लेकिन बाद से उबरने का कोई उचित परिणाम सामने नहीं आया है। इसके विपरीत बाढ़ से होने वाली क्षति बढ़ती जा रही है।

बाढ़ नियन्त्रण के उपाय (Preventing Methods from Flood)

बाढ़ की विभीषिका से बचने के लिए अनेक उपाय काम में लाये जाते हैं, जैसे-डालू भूमि पर वृक्षारोपण, नदी तटबन्धों का निर्माण, आवासीय स्थलों को ऊँचा करना, जल निकासी का प्रबन्ध, बाँच और का निर्माण, बाद आगमन की चेतावनी और अन्य सुरक्षा कार्य। लेकिन यह सत्य है कि भारत के बादग्रस्त क्षेत्रों की नदियाँ जल जमाव, मोड़ और मार्ग संकुचन से आक्रान्त है। फलतः इनमें अधिक जल आ जाने से बाढ़ का आना स्वाभाविक है। बाढ़ की कम करने के लिए यह आवश्यक है कि इनकी प्रवाह क्षमता में वृद्धि की जाये। यह नदी ड्रेनिंग योजना से सम्भव है जिस पर अभी ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

बाढ़ नियन्त्रण के लिए दो तरह के उपाय किये जाते हैं

(1) संरचनात्मक (Structural) संरचनात्मक उपायों के अन्तर्गत बाँध बनाना, तटबन्ध बनाना, नदियों के मार्ग को गहरा करना तथा बाढ़ से राहत हेतु छमक (Spill over channel) नालियों का निर्माण करना आता है। बाढ़ के मैदानों को काल प्रखण्डों में बाँटकर उनका नियोजन करते हैं, जैसे—प्रतिवर्ष प्रति पाँचवें वर्ष प्रति बीस वर्ष वाले बाढ़ के क्षेत्र आदि। इसे बाढ़ नियोजन (Flood plain zoning) विधि कहते हैं।

(2) व्यवहारजन्य ( Behavioural) बाढ़ विपदा से मनुष्य को जूझना ही पड़ता है तथा हानि को स्वीकार करना पड़ता है। क्योंकि यह एक प्राकृतिक संकट है। यह संकट मानवजन्य भी है। इससे निपटने के लिए आर्थिक सहायता देना, बाढ़ बीमा (Flood insurance) करना, बाढ़ का पूर्वानुमान करना आवश्यक होता है।

मेरा नाम संध्या गुप्ता है, मैं इस ब्लॉग का लेखक और सह-संस्थापक हूं। मेरा उद्देश्य इस ब्लॉग के माध्यम से आपको कई विषयों की जानकारी देना है। मुझे ज्ञान बांटना अच्छा लगता है। अगर आप मुझसे कुछ सीख सकते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here